Bihar Board Class 10th Sanskrit (संस्कृत पीयूषम् भाग 2) Chapter 7 नीतिश्लोकाः) Solutions
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| Board Name | Bihar Board of Secondary Education |
| Class | Class 10th |
| Content Type | Solution |
| Solution for | Class 10th students |
| Subject | Sanskrit (संस्कृत पीयूषम् भाग 2) |
| Chapter Name | Chapter 7 नीतिश्लोकाः) |
| Total Number of Chapter in this Subject | 13 |
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Bihar Board Class 10th Sanskrit (संस्कृत पीयूषम् भाग 2) Chapter 7 नीतिश्लोकाः) Solutions
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नीतिश्लोकाः (पाठ ७)
1. अधोलिखितेषु श्लोकेषु रेखांकितपदानां सन्दर्भानुसारं शुद्धम् अर्थं चित्वा लिखत –
(क) सन्तः स्वयं परिक्लेशं सहन्ते न तु पीडयन्।
(i) सज्जनाः
(ii) दुर्जनाः
(iii) साधवः
(iv) सन्ततिः
उत्तर: (i) सज्जनाः
व्याख्या: इस श्लोक में 'सन्तः' शब्द का अर्थ 'सज्जन व्यक्ति' या 'अच्छे लोग' होता है। सज्जन लोग स्वयं कष्ट सह लेते हैं, लेकिन दूसरों को पीड़ा नहीं देते। अन्य विकल्प इस संदर्भ में उपयुक्त नहीं हैं।
(ख) सन्तः स्वयं परिक्लेशं सहन्ते न तु पीडयन्।
(i) कष्टम्
(ii) सुखम्
(iii) दुःखम्
(iv) आनन्दम्
उत्तर: (i) कष्टम्
व्याख्या: 'परिक्लेशं' शब्द का यहाँ सही अर्थ 'कष्ट' या 'कठिनाई' है। श्लोक का भाव है कि सज्जन लोग अपने लिए आने वाला कष्ट स्वयं सहन कर लेते हैं, दूसरों को उससे पीड़ित नहीं करते।
(ग) सन्तः स्वयं परिक्लेशं सहन्ते न तु पीडयन्।
(i) पीड़ां ददति
(ii) पीड़ां कुर्वन्ति
(iii) पीड़ां गृह्णन्ति
(iv) पीड़ां यच्छन्ति
उत्तर: (i) पीड़ां ददति
व्याख्या: 'पीडयन्' क्रिया का अर्थ है 'पीड़ा देना' या 'दुःख पहुँचाना'। श्लोक में इसका प्रयोग यह बताने के लिए हुआ है कि सज्जन लोग दूसरों को पीड़ा नहीं देते। 'पीड़ां ददति' इसी अर्थ को स्पष्ट करता है।
2. एकपदेन उत्तरत –
(क) केषां मनसि विद्यते हि चपलता?
उत्तर: अल्पबुद्धीनाम् (अल्पबुद्धि वालों के)
व्याख्या: श्लोक के अनुसार, जिनकी बुद्धि कम या छोटी होती है, उनके मन में चंचलता (विचलित होने की प्रवृत्ति) रहती है। बुद्धिमान लोगों का मन स्थिर रहता है।
(ख) कः क्रुद्धः न प्रवर्तते?
उत्तर: सज्जनः (सज्जन व्यक्ति)
व्याख्या: सज्जन व्यक्ति क्रोधित होने पर भी अनुचित या हानिकारक कार्य नहीं करता। वह अपने क्रोध पर नियंत्रण रखता है और विवेक से काम लेता है।
(ग) कस्य मनः न चलति?
उत्तर: धीरस्य (धैर्यवान/बुद्धिमान व्यक्ति के)
व्याख्या: धैर्यवान और बुद्धिमान व्यक्ति का मन विपरीत परिस्थितियों में भी डगमगाता नहीं है। उसका मन दृढ़ और स्थिर रहता है।
3. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषायां लिखत –
(क) सज्जनाः कीदृशं कष्टं सहन्ते?
उत्तर: सज्जनाः स्वयं परिक्लेशं (स्वयं के कष्ट को) सहन्ते।
व्याख्या: सज्जन लोग अपने ऊपर आए हुए कष्ट को धैर्यपूर्वक सहन कर लेते हैं। वे अपने दुःख को दूसरों पर नहीं थोपते और न ही उसके लिए दूसरों को दोष देते हैं।
(ख) अल्पबुद्धीनां कीदृशी चपलता भवति?
उत्तर: अल्पबुद्धीनां मनसि चपलता विद्यते।
व्याख्या: जिन लोगों की बुद्धि अल्प (कम) होती है, उनके मन में चपलता (अस्थिरता) होती है। ऐसे लोग किसी एक विषय या कार्य पर टिककर नहीं रह पाते, उनका मन इधर-उधर भटकता रहता है।
(ग) सज्जनः क्रुद्धः सन् किं न करोति?
उत्तर: सज्जनः क्रुद्धः सन् अनुचितं कार्यं न करोति / न प्रवर्तते।
व्याख्या: सज्जन व्यक्ति क्रोधित होने पर भी अपना संयम नहीं खोता। वह क्रोध के आवेग में आकर कोई अनुचित, अशोभनीय या दूसरों को हानि पहुँचाने वाला कार्य नहीं करता। उसका विवेक क्रोध पर हावी रहता है।
4. सन्धि/सन्धिविच्छेदं कुरुत –
(क) सदैव
उत्तर: सदैव = सदा + एव
व्याख्या: यह 'अ + ए = ऐ' स्वर सन्धि का उदाहरण है। 'सदा' शब्द के अंत का 'आ' और 'एव' शब्द के आदि का 'ए' मिलकर 'ऐ' बन जाता है, जिससे 'सदैव' शब्द बनता है।
(ख) ह्यपेतः
उत्तर: ह्यपेतः = हि + अपेतः
व्याख्या: यह व्यंजन सन्धि का उदाहरण है। 'हि' शब्द के अंत का इकार और 'अपेतः' के आदि का अकार मिलने पर इकार का लोप हो जाता है, जिससे 'ह्यपेतः' रूप बनता है।
5. रेखांकितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –
(क) सन्तः स्वयं परिक्लेशं सहन्ते।
उत्तर: के स्वयं परिक्लेशं सहन्ते?
व्याख्या: रेखांकित पद 'सन्तः' (सज्जन लोग) कर्ता है। कर्ता के बारे में पूछने के लिए प्रश्नवाचक शब्द 'के' का प्रयोग किया गया है।
(ख) अल्पबुद्धीनां मनसि चपलता विद्यते।
उत्तर: कस्य मनसि चपलता विद्यते?
व्याख्या: रेखांकित पद 'अल्पबुद्धीनाम्' संबंध कारक (षष्ठी विभक्ति) में है, जिसका अर्थ 'अल्पबुद्धि वालों के' है। संबंध पूछने के लिए प्रश्नवाचक शब्द 'कस्य' (किसके) का प्रयोग हुआ है।
(ग) सज्जनः क्रुद्धः सन् न प्रवर्तते।
उत्तर: कः क्रुद्धः सन् न प्रवर्तते?
व्याख्या: रेखांकित पद 'सज्जनः' (सज्जन व्यक्ति) कर्ता है। कर्ता के लिए प्रश्नवाचक शब्द 'कः' (कौन) का प्रयोग किया गया है।
पाठ सारांश: इस अध्याय के नीतिश्लोकों के माध्यम से हमें सज्जनों के गुणों का ज्ञान होता है। सज्जन स्वयं कष्ट सहन करते हैं, दूसरों को पीड़ा नहीं देते, क्रोध में भी अनुचित कार्य नहीं करते और उनका मन स्थिर रहता है। इसके विपरीत, कम बुद्धि वालों का मन चंचल होता है। ये श्लोक हमें अच्छे चरित्र और व्यवहार की शिक्षा देते हैं।
नीतिश्लोकाः - प्रश्नोत्तराणि
प्रश्न 17.
कः पुरुष: सुलभः अस्ति? (A) दुराचारी (B) प्रियवादी (C) मिथ्यावादी (D) असत्यवादी
उत्तर: (B) प्रियवादी
व्याख्या: प्रियवादी पुरुषः (मधुर बोलने वाला व्यक्ति) सुलभः अस्ति, अर्थात् सबके लिए सहज और प्राप्त करने योग्य होता है। ऐसे व्यक्ति का समाज में सभी से सरलता से मेल-जोल हो जाता है।
प्रश्न 18.
का विशेषतः रक्ष्या? (A) धनम् (B) दुःखिनः (C) स्त्रियः (D) बालः
उत्तर: (C) स्त्रियः
व्याख्या: स्त्रियः (नारियाँ) विशेषतः रक्ष्या अर्थात् विशेष रूप से रक्षा करने योग्य हैं। नीतिशास्त्र के अनुसार, समाज में स्त्रियों की सुरक्षा और सम्मान पर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि उनकी रक्षा से ही कुल और समाज की रक्षा होती है।
प्रश्न 19.
ह्रियते हि धर्मः केन? (A) लक्षणम् (B) अलक्षणम् (C) कुलम् (D) वृत्तम्
उत्तर: (B) अलक्षणम्
व्याख्या: अलक्षणम् (दुर्गुणों या बुरे लक्षणों) के द्वारा धर्म ह्रियते अर्थात नष्ट हो जाता है। जब व्यक्ति में दुर्गुण आ जाते हैं, तो उसका धर्म (कर्तव्य और नैतिकता) नष्ट होने लगता है।
प्रश्न 20. नीतिश्लोकानां रचनाकार: क: अस्ति?
(A) महात्मा विदुरः (B) महात्मा वाल्मीकि: (C) कालिदास: (D) महर्षि वेदव्यासः
उत्तर: (A) महात्मा विदुरः
व्याख्या: इस अध्याय में संकलित नीतिश्लोकों के रचनाकार महात्मा विदुरः हैं। ये श्लोक महाभारत के 'उद्योग पर्व' के अंतर्गत 'विदुरनीति' नामक प्रसिद्ध उपदेश से लिए गए हैं, जो विदुर जी द्वारा राजा धृतराष्ट्र को दिए गए थे।
प्रश्न 21.
“विदुरनीतेः” कस्य रचना अस्ति? (A) मनोः (B) महात्माविदुरस्य (C) वाल्मीके: (D) राधारमणस्य
उत्तर: (B) महात्माविदुरस्य
व्याख्या: "विदुरनीतेः" अर्थात 'विदुरनीति' नामक ग्रंथ की रचना महात्मा विदुरस्य (महात्मा विदुर के द्वारा) की गई है। इसमें राजनीति, नैतिकता और जीवन जीने के सूत्र समाहित हैं।
प्रश्न 22.
विदुरनीते: संकलित: पाठस्य नाम किम् असित? (A) नीतिश्लोका: (B) भारतमहिमा (C) मञ्जुलम् (D) मन्दाकिनीवर्णनम्
उत्तर: (A) नीतिश्लोका:
व्याख्या: विदुरनीति से संकलित हमारे पाठ का नाम नीतिश्लोका: है। इस पाठ में विदुर जी के कुछ चुनिंदा नीति संबंधी श्लोकों को सम्मिलित किया गया है, जो जीवन के लिए मार्गदर्शक हैं।
प्रश्न 23.
प्रश्नोत्तररूपे क: ग्रन्थ: अस्ति? (A) मनुस्मृति (B) मेघदूतम् (C) विदुरनीतिः (D) मृच्छकटिकम्
उत्तर: (C) विदुरनीतिः
व्याख्या: विदुरनीतिः नामक ग्रंथ प्रश्नोत्तर रूप में अस्ति। इसमें राजा धृतराष्ट्र के प्रश्नों के उत्तर में ही महात्मा विदुर नीति के सूत्र बताते हैं, इसलिए यह प्रश्नोत्तर शैली में लिखा गया है।
प्रश्न 24.
कस्य प्रश्नस्य उत्तर विदुरः ददाति? (A) दुःशासनस्य (B) कृष्णस्य (C) अर्जुनस्य (D) घृतराष्ट्रस्य
उत्तर: (D) घृतराष्ट्रस्य
व्याख्या: विदुर जी घृतराष्ट्रस्य (राजा धृतराष्ट्र) के प्रश्नों के उत्तर देते हैं। धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों (कौरवों) के दुराचार और भविष्य की चिंता में विदुर जी से मार्गदर्शन माँगा था।
प्रश्न 25.
धर्म: ............ रक्ष्यते। रिक्त स्थानानि पूरयत। (A) योगेन (B) धनेन (C) सत्येन (D) कुलेन
उत्तर: (C) सत्येन
व्याख्या: धर्म: सत्येन रक्ष्यते। अर्थात, धर्म की रक्षा सत्य के द्वारा होती है। सत्य ही वह आधार है जिस पर धर्म टिका रहता है; सत्य के बिना धर्म का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता।
प्रश्न 26.
अनाहूतः कः प्रविशति? । (A) विद्वान् (B) कर्मशीलः (C) कुशलः (D) मूढ़चेतानराधमः
उत्तर: (D) मूढचेतानराधमः
व्याख्या: अनाहूतः (बिना बुलाए) मूढचेतानराधमः (मूर्ख, नीच बुद्धि वाला और अधम व्यक्ति) प्रविशति अर्थात प्रवेश करता है। शिष्टाचार के अनुसार बिना बुलाए किसी के यहाँ जाना अशोभनीय माना जाता है, और ऐसा केवल एक अज्ञानी या दुर्जन ही करता है।
प्रश्न 27.
विदुरः कः आसीत्? (A) राज्ञप्रवरः (B) ब्रह्मप्रवरः (C) मंत्रीप्रवरः (D) विद्वप्रवरः
उत्तर: (C) मंत्रीप्रवरः
व्याख्या: विदुरः मंत्रीप्रवरः आसीत्, अर्थात वे हस्तिनापुर के महामंत्री थे। वे न केवल धृतराष्ट्र के मंत्री थे, बल्कि नीति एवं न्याय में पारंगत, दूरदर्शी और प्रजाहितैषी थे।
प्रश्न 28.
उत्तमा शान्ति: का? (A) विवेक (B) ज्ञानं (C) क्षमा (D) शास्त्र
उत्तर: (C) क्षमा
व्याख्या: उत्तमा शान्ति: क्षमा (क्षमाशीलता) अस्ति। दूसरों के दोषों और अपराधों को क्षमा कर देने में ही सर्वोत्तम शांति निहित है। क्षमा से मन का वैरभाव मिटता है और आंतरिक शांति प्राप्त होती है।
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