Bihar Board Class 10th Science (विज्ञान) Chapter 9 अनुवांशिकता एवं जैव विकास) Solutions
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Here we have provided Solution for Chapter 9 अनुवांशिकता एवं जैव विकास) of Science (विज्ञान) subject for Class 10th students of Bihar Board of Secondary Education. There are various chapters in this Science (विज्ञान) such as Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण), Chapter 2 अम्ल, क्षारक एवं लवण), Chapter 3 धातु एवं अधातु), Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक), Chapter 5 तत्वों का आवर्त वर्गीकरण), Chapter 6 जैव प्रक्रम), Chapter 7 नियंत्रण एवं समन्वय), Chapter 8 जीव जनन कैसे करते है), Chapter 9 अनुवांशिकता एवं जैव विकास), Chapter 10 प्रकाश(परावर्तन तथा अपवर्तन), Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार), Chapter 12 विद्युत), Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव), Chapter 14 उर्जा के स्रोत), Chapter 15 हमारा पर्यावरण) and Chapter 16 प्राकृतिक संसाधनों का संपोषित प्रबंधन). Summary of the same is given below:
| Board Name | Bihar Board of Secondary Education |
| Class | Class 10th |
| Content Type | Solution |
| Solution for | Class 10th students |
| Subject | Science (विज्ञान) |
| Chapter Name | Chapter 9 अनुवांशिकता एवं जैव विकास) |
| Total Number of Chapter in this Subject | 16 |
Studying Bihar Board Class 10th Science (विज्ञान) Chapter 9 अनुवांशिकता एवं जैव विकास) solution will help you higher marks in this subject but you need to follow best practices to achieve higher marks, which are given after solutions, go through them once.
Bihar Board Class 10th Science (विज्ञान) Chapter 9 अनुवांशिकता एवं जैव विकास) Solutions
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1. मेंडल ने अपने प्रयोगों के लिए किस पौधे को चुना?
2. एक समयुग्मजी लम्बे पौधे (TT) का एक समयुग्मजी बौने पौधे (tt) के साथ संकरण कराने पर F1 पीढ़ी में प्राप्त संतति का जीन प्ररूप लिखिए।
3. निम्नलिखित में से कौन-सा संतति में पैतृक लक्षणों के संयोजन के लिए उत्तरदायी है?
(a) कोशिका विभाजन
(b) लिंग निर्धारण
(c) कोशिका विभाजन एवं युग्मक निर्माण
(d) युग्मक निर्माण
4. जीवाश्म क्या हैं? ये किस प्रकार बनते हैं?
जीवाश्म प्राचीन काल के पौधों, जानवरों और अन्य जीवों के अवशेष या छाप होते हैं, जो चट्टानों की परतों में संरक्षित पाए जाते हैं।
जीवाश्म बनने की प्रक्रिया: जीवाश्म बनने की मुख्य प्रक्रिया को शिलीभवन (पेट्रीफिकेशन) कहते हैं। यह निम्न चरणों में होता है:
- किसी जीव की मृत्यु के बाद उसका शरीर तलछट (रेत, मिट्टी, कीचड़) से ढक जाता है।
- समय के साथ, ये तलछट परत दर परत जमकर कठोर चट्टान में बदल जाती हैं।
- जीव के नरम ऊतक सड़-गल जाते हैं, लेकिन कठोर भाग जैसे हड्डियाँ, दाँत, खोल या लकड़ी बचे रहते हैं।
- धीरे-धीरे भूमिगत खनिज युक्त जल इन कठोर भागों के रिक्त स्थानों में भर जाता है और क्रिस्टल बना देता है, जिससे जीव का एक पत्थर जैसा ढाँचा बन जाता है।
- कभी-कभी जीव पूरी तरह विघटित हो जाता है और चट्टान पर केवल उसकी एक खोखली छाप (मोल्ड) या उस छाप में भरा हुआ पदार्थ (कास्ट) रह जाता है।
जीवाश्म हमें पृथ्वी के इतिहास में रहने वाले जीवों के बारे में जानकारी देते हैं और जैव विकास के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।
5. समजात अंग क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
समजात अंग वे अंग होते हैं जिनकी आधारभूत संरचना एवं उद्गम समान होता है, लेकिन उनके कार्य एवं बाहरी रूप में अंतर हो सकता है। ये अंग एक ही पूर्वज से विकसित हुए हैं, लेकिन विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुसार उनमें विभिन्नताएँ आ गई हैं।
उदाहरण:
- स्तनधारियों के अग्रपाद: मनुष्य का हाथ, बिल्ली का पंजा, घोड़े का अगला पैर, चमगादड़ के पंख और व्हेल मछली की अगली पंख (फ्लिपर) की हड्डियों की मूल संरचना (ह्यूमरस, रेडियस, अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स और फैलेंजेस) समान है। लेकिन इनका कार्य भिन्न है – पकड़ना, दौड़ना, उड़ना और तैरना।
- पौधों के अंग: आलू का भूमिगत तना (कंद), प्याज का तना (बल्ब), और बरगद के हवाई जड़ों वाले तने की आधारभूत संरचना एक समान (तने की) है, लेकिन उनके कार्य भिन्न हैं।
1. मेंडल के एक प्रयोग में लम्बे मटर के पौधे जिनके बैंगनी पुष्प थे, का संकरण बौने पौधों जिनके सफेद पुष्प थे, से कराया गया। इनकी संतति के सभी पौधों में पुष्प बैंगनी रंग के थे परन्तु आधे बौने थे। इससे कहा जा सकता है कि लम्बे जनक पौधों की आनुवंशिक रचना निम्न थी:
(A) TTWW(B) TTww
(C) TtWW
(D) TtWw
उत्तर: (C) TtWW
व्याख्या: मेंडल के इस प्रयोग में, लम्बापन प्रभावी लक्षण (T) तथा बौनापन अप्रभावी (t) है। इसी प्रकार बैंगनी पुष्प प्रभावी (W) तथा सफेद पुष्प अप्रभावी (w) है। चूँकि सभी संतति पौधों में बैंगनी पुष्प थे, इसका अर्थ है कि लम्बे जनक (बैंगनी पुष्प वाले) में सफेद पुष्प का अप्रभावी अलील (w) नहीं था। साथ ही, आधी संतति बौनी थी, जो दर्शाता है कि लम्बे जनक में बौनेपन का अप्रभावी अलील (t) छिपा हुआ था। अतः लम्बे बैंगनी पुष्प वाले जनक की आनुवंशिक संरचना TtWW थी, जहाँ Tt से लम्बापन (परंतु बौनेपन का अलील भी) तथा WW से शुद्ध बैंगनी पुष्प का पता चलता है।
2. समजात अंग का उदाहरण है-
(A) हमारा हाथ तथा कुत्ते के अग्रपाद(B) हमारे दाँत तथा हाथी के दाँत
(C) आलू एवं घास के उपरिभूस्तारी
(D) उपरोक्त सभी
उत्तर: (D) उपरोक्त सभी
व्याख्या: समजात अंग वे अंग होते हैं जिनकी आधारभूत संरचना एवं उत्पत्ति समान होती है, परन्तु वे भिन्न-भिन्न कार्य करते हैं। दिए गए सभी विकल्प इसकी उदाहरण हैं: (A) मानव हाथ एवं कुत्ते का अग्रपाद दोनों स्तनधारियों के अग्रपाद के रूपांतर हैं। (B) मानव दाँत एवं हाथी के दाँत दोनों दंत समजात संरचनाएँ हैं। (C) आलू का कंद (भूमिगत तना) एवं घास का उपरिभूस्तारी (रनर) दोनों तने के रूपांतर हैं। अतः सभी विकल्प समजात अंगों के उदाहरण हैं।
3. विकासीय दृष्टिकोण से हमारी किससे अधिक समानता है-
(A) चीन के विद्यार्थी(B) चिम्पैंजी
(C) मकड़ी
(D) बैक्टीरिया
उत्तर: (A) चीन के विद्यार्थी
व्याख्या: विकासीय दृष्टिकोण से, जीवों के बीच समानता उनकी आनुवंशिक निकटता पर निर्भर करती है। मानव (हम) और चीन का विद्यार्थी दोनों एक ही जाति (Homo sapiens) के सदस्य हैं, इसलिए उनके बीच आनुवंशिक समानता लगभग 99.9% है। चिम्पैंजी हमारा निकटतम जीवित रिश्तेदार है, परन्तु फिर भी आनुवंशिक समानता लगभग 98-99% ही है। मकड़ी और बैक्टीरिया तो हमसे बहुत दूर के जीव हैं। अतः सबसे अधिक समानता निश्चित रूप से एक अन्य मानव (चीन के विद्यार्थी) से ही है।
4. मेंडल के प्रयोगों द्वारा किस बात की पुष्टि हुई?
उत्तर: मेंडल के प्रयोगों द्वारा निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातों की पुष्टि हुई:
- आनुवंशिकता की मूल इकाई 'कारक' (जिसे आज हम जीन कहते हैं) होती है, जो माता-पिता से संतति में स्थानांतरित होती है।
- प्रत्येक लक्षण के लिए दो कारक (अलील) होते हैं, जो एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से वंशागत होते हैं।
- कुछ कारक 'प्रभावी' होते हैं (जो लक्षण को व्यक्त करते हैं) तथा कुछ 'अप्रभावी' होते हैं (जो प्रभावी की उपस्थिति में छिपे रहते हैं)।
- संकरण के दौरान, ये कारक युग्मक (गैमीट) निर्माण के समय अलग-अलग हो जाते हैं और निषेचन के दौरान यादृच्छिक रूप से जुड़ते हैं। इसे 'युग्मकों की शुद्धता का नियम' कहा जाता है।
- इन प्रयोगों ने आनुवंशिकी के आधारभूत नियमों – प्रभाविता का नियम, पृथक्करण का नियम तथा स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम – की पुष्टि की।
5. उद्विकास के प्रमाण के रूप में जीवाश्म क्या सूचना देते हैं?
उत्तर: जीवाश्म उद्विकास (विकास) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण प्रदान करते हैं। ये हमें निम्नलिखित सूचनाएँ देते हैं:
- प्राचीन जीवन का रिकॉर्ड: जीवाश्म हमें बताते हैं कि करोड़ों वर्ष पहले पृथ्वी पर किस प्रकार के जीव रहते थे, जो अब विलुप्त हो चुके हैं।
- क्रमिक परिवर्तन का प्रमाण: विभिन्न भूवैज्ञानिक परतों में पाए गए जीवाश्मों के अध्ययन से हम देख सकते हैं कि किसी जीव के सरल रूप से जटिल रूप की ओर क्रमिक परिवर्तन कैसे हुआ। उदाहरण के लिए, घोड़े के जीवाश्म उसके आकार, पैरों की उंगलियों की संख्या आदि में हुए परिवर्तन को दर्शाते हैं।
- जीवों के बीच संबंध: जीवाश्म यह दर्शाने में मदद करते हैं कि आधुनिक जीवों का संबंध प्राचीन जीवों से कैसे है। उदाहरण के लिए, पक्षियों के जीवाश्म (आर्कियोप्टेरिक्स) में सरीसृप और पक्षी दोनों के लक्षण हैं, जो यह सिद्ध करता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों से हुआ होगा।
- विलुप्ति की कहानी: जीवाश्म अचानक विलुप्ति के घटनाक्रम (जैसे डायनासोर का विलुप्त होना) को भी दर्शाते हैं, जो पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रभाव को समझने में सहायक है।
इस प्रकार, जीवाश्म पृथ्वी के जीवन के इतिहास की एक 'समय-रेखा' प्रस्तुत करते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि जीवन सरल रूपों से जटिल रूपों की ओर निरंतर विकसित होता रहा है।
6. विकासीय संबंध स्थापित करने में आणविक समजातता किस प्रकार सहायक है?
उत्तर: आणविक समजातता से तात्पर्य विभिन्न जीवों में पाए जाने वाले प्रोटीन (जैसे हीमोग्लोबिन, साइटोक्रोम-C) तथा DNA के अनुक्रमों (सीक्वेंस) में समानता से है। यह विकासीय संबंध स्थापित करने में निम्न प्रकार से सहायक है:
- आनुवंशिक निकटता का माप: दो जीवों के DNA या प्रोटीन के अनुक्रम जितने अधिक समान होंगे, उनका विकासीय संबंध उतना ही निकट माना जाएगा। उदाहरण के लिए, मनुष्य और चिम्पैंजी का DNA लगभग 99% समान है, जो दर्शाता है कि हमारा एक सामान्य पूर्वज हाल ही में (विकासीय समय के पैमाने पर) रहा होगा।
- विकास के समय का अनुमान: DNA अनुक्रमों में अंतर (उत्परिवर्तन) की दर निश्चित मानी जाती है। इन अंतरों की तुलना करके वैज्ञानिक यह अनुमान लगा सकते हैं कि दो जातियाँ अपने सामान्य पूर्वज से कितने समय पहले अलग हुई होंगी।
- समजात अंगों की पुष्टि: शारीरिक समजातता (जैसे चमगादड़ का पंख और मनुष्य का हाथ) की पुष्टि आणविक स्तर पर भी होती है। इन अंगों के विकास को नियंत्रित करने वाले जीन (HOX जीन) विभिन्न जीवों में समान पाए जाते हैं।
- वर्गीकरण में सहायता: पारंपरिक वर्गीकरण (रूप-रंग के आधार पर) में उलझन पैदा करने वाले जीवों के विकासीय संबंध आणविक आंकड़ों से स्पष्ट हो जाते हैं।
अतः, आणविक समजातता जीवों के बीच विकासीय संबंधों का एक अत्यंत शक्तिशाली और सटीक प्रमाण प्रदान करती है।
7. एक प्रयोग में, F2 पीढ़ी में लम्बे एवं बौने मटर के पौधों का अनुपात 3 : 1 था। इसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर: यह प्रयोग मेंडल के पृथक्करण के नियम को दर्शाता है।
व्याख्या: मान लीजिए लम्बापन प्रभावी लक्षण (T) है और बौनापन अप्रभावी (t) है। शुद्ध लम्बे (TT) और शुद्ध बौने (tt) पौधों के बीच संकरण कराने पर F1 पीढ़ी के सभी पौधे लम्बे (Tt) होंगे, क्योंकि प्रभावी लक्षण (T) अप्रभावी (t) पर छा जाता है।
जब इन F1 पौधों (Tt) का स्व-परागण कराया जाता है, तो युग्मक निर्माण के समय 'T' और 't' कारक अलग-अलग हो जाते हैं। इससे दो प्रकार के युग्मक बनते हैं: आधे युग्मक 'T' लेकर और आधे 't' लेकर।
ये युग्मक यादृच्छिक रूप से संयोग करते हैं, जिससे F2 पीढ़ी में निम्न संयोजन बनते हैं:
| युग्मक | T (0.5) | t (0.5) |
|---|---|---|
| T (0.5) | TT (लम्बा) | Tt (लम्बा) |
| t (0.5) | Tt (लम्बा) | tt (बौना) |
इस पुनेट वर्ग से स्पष्ट है कि F2 पीढ़ी में:
- लम्बे पौधे: TT और Tt (कुल 3 भाग)
- बौने पौधे: केवल tt (1 भाग)
अतः लम्बे एवं बौने पौधों का अनुपात 3 : 1 प्राप्त होता है। यह अनुपात दर्शाता है कि F1 पीढ़ी में छिपा हुआ अप्रभावी कारक (t) F2 पीढ़ी में पृथक होकर पुनः व्यक्त हो जाता है।
8. जैव विकास से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: जैव विकास (उद्विकास) वह धीमी, सतत और लंबी प्रक्रिया है जिसके द्वारा सरल संरचना वाले जीवों से, अनेक पीढ़ियों में होने वाले आनुवंशिक परिवर्तनों (उत्परिवर्तन) तथा प्राकृतिक वरण के कारण, अधिक जटिल एवं नए प्रकार के जीवों का विकास होता है।
मुख्य बिंदु:
- यह एक वंशानुक्रमिक परिवर्तन है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी जनसंख्या के आनुवंशिक लक्षणों में होता है।
- विकास का मुख्य कारण प्राकृतिक वरण है, जिसमें पर्यावरण के अनुकूल लक्षण वाले जीव जीवित रहते और प्रजनन करते हैं, जबकि प्रतिकूल लक्षण वाले समय के साथ विलुप्त हो जाते हैं।
- विकास का अर्थ केवल 'प्रगति' या 'बेहतर होना' नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण के अनुकूलन की प्रक्रिया है।
- आज पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीव (पौधे, जंतु, सूक्ष्मजीव) अरबों वर्षों के विकास का परिणाम हैं, जिनका उद्भव एक सामान्य पूर्वज से हुआ माना जाता है।
सरल शब्दों में, जैव विकास वह प्रक्रिया है जिसने हमें एककोशिकीय जीव से लेकर आज के जटिल मानव तक के सफर में बदला है।
9. हमारे वैज्ञानिकों ने किस प्रकार से विभिन्न कृषि पौधों का विकास किया है?
उत्तर: भारतीय वैज्ञानिकों ने कृषि पौधों के विकास के लिए पारंपरिक तथा आधुनिक दोनों प्रकार की विधियों का उपयोग किया है:
- संकरण (Hybridization): दो अलग-अलग किस्मों या प्रजातियों के बीच पर-परागण कराकर नई संकर किस्में विकसित की गई हैं। इनमें उच्च उपज, रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा पर्यावरणीय तनाव सहने की क्षमता जैसे वांछित लक्षणों का समावेश किया जाता है। उदाहरण: गेहूँ की उन्नत किस्में (जैसे सोनालिका), धान की किस्में (जैसे IR-8, जया)।
- चयनात्मक प्रजनन (Selective Breeding): कई पीढ़ियों तक केवल उन पौधों का चयन किया जाता है जिनमें वांछित लक्षण (जैसे बड़े दाने, अधिक तेल) हों, जिससे धीरे-धीरे नई किस्म बन जाती है।
- उत्परिवर्तन प्रजनन (Mutation Breeding): पौधों को रासायनिक पदार्थों या विकिरण (जैसे गामा किरणें) के संपर्क में लाकर उनके जीनोम में उत्परिवर्तन उत्पन्न किए जाते हैं। फिर इनमें से उपयोगी लक्षणों वाले पौधों का चयन किया जाता है। उदाहरण: अरहर की प्रारंभिक पकने वाली किस्में।
- जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology): आनुवंशिक इंजीनियरिंग तथा ऊतक संवर्धन जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके पौधों का विकास किया जाता है। उदाहरण: Bt कपास (कीट प्रतिरोधी), सुनहरे चावल (विटामिन-ए युक्त)।
- सूक्ष्म प्रवर्धन (Micropropagation): इस तकनीक द्वारा कम समय में अधिक संख्या में स्वस्थ और रोगमुक्त पौधे तैयार किए जाते हैं, जैसे केले, गन्ने और आलू में।
इन विधियों के माध्यम से वैज्ञानिकों ने देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, किसानों की आय बढ़ाने और पोषण स्तर सुधारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
10. समवृत्ति अंग क्या हैं? उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर: समवृत्ति अंग वे अंग होते हैं जिनका मूलभूत संरचना एवं उत्पत्ति भिन्न होती है, परन्तु वे समान कार्य करते हैं। ये अंग विकास की प्रक्रिया में अभिसारी विकास के उदाहरण हैं, जहाँ भिन्न पूर्वजों से उत्पन्न जीव समान पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण समान कार्य करने वाले अंग विकसित कर लेते हैं।
उदाहरण:
- पक्षियों के पंख और कीटों के पंख:
- पक्षी का पंख: अग्रपाद (हाथ) के रूपांतर से बना है। संरचना हड्डियों, मांसपेशियों और पंखों से बनी है।
- तितली का पंख: काइटिन के बने हुए पतले झिल्लीनुमा आवरण हैं, जो वक्ष से निकलते हैं।
- समानता: दोनों उड़ने का कार्य करते हैं।
- मनुष्य की आँख और ऑक्टोपस की आँख:
- दोनों देखने का कार्य करती हैं, परन्तु इनकी संरचना और विकास की प्रक्रिया पूरी तरह भिन्न है।
- मटर के पौधे की प्रतान और कैक्टस का काँटा:
- प्रतान: पत्ती का रूपांतर है जो चढ़ने में सहायता करता है।
- काँटा: पत्ती का ही रूपांतर है जो जल की कमी में वाष्पोत्सर्जन रोकता और रक्षा करता है।
- दोनों पत्ती से बने हैं (समजात), परन्तु यहाँ उदाहरण के लिए, यदि हम कैक्टस के काँटे (पत्ती से बना) और गुलाब के काँटे (तने के बाहरी उभार से बना) की तुलना करें, तो वे समवृत्ति होंगे, क्योंकि दोनों रक्षा का कार्य करते हैं पर उत्पत्ति भिन्न है।
समवृत्ति अंग यह दर्शाते हैं कि भिन्न उत्पत्ति के बावजूद, प्रकृति में समान कार्यों के लिए समान समाधान विकसित हो सकते हैं।
प्रश्न 1. मेंडल के एक प्रयोग में लम्बे मटर के पौधे जिनके बैंगनी पुष्प थे, का संकरण बौने पौधों जिनके सफेद पुष्प थे, से कराया गया। इनकी संतति के सभी पौधों में पुष्प बैंगनी रंग के थे। परन्तु उनमें से लगभग आधे बौने थे। इससे कहा जा सकता है कि लम्बे जनक पौधों की आनुवंशिक रचना निम्न थी:
(A) TTWW
(B) TTww
(C) TtWW
(D) TtWw
उत्तर: (C) TtWW
व्याख्या: इस प्रयोग में, लम्बाई (T) और पुष्प रंग (W) दोनों के लिए जनकों के जीन देखने होंगे। सभी संतति पौधों में बैंगनी पुष्प (प्रभावी लक्षण) थे, जिसका अर्थ है कि लम्बे जनक से सभी संततियों को बैंगनी पुष्प का प्रभावी एलील (W) मिला। चूँकि कोई भी संतति सफेद पुष्प वाली नहीं थी, इसलिए लम्बे जनक में सफेद पुष्प का अप्रभावी एलील (w) नहीं था। अतः लम्बे जनक का पुष्प रंग जीनोटाइप WW था। लम्बाई के लिए, लगभग आधी संतति बौनी (tt) थी, जो दर्शाता है कि लम्बे जनक में लम्बेपन का प्रभावी एलील (T) और बौनेपन का अप्रभावी एलील (t) दोनों थे, यानी वह संकर (Tt) था। इस प्रकार, लम्बे जनक की आनुवंशिक रचना TtWW थी।
प्रश्न 2. समजात अंग का उदाहरण है:
(A) हमारा हाथ तथा कुत्ते के अग्रपाद
(B) हमारे दाँत तथा हाथी के दाँत
(C) आलू एवं घास के उपरिभूस्तारी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (D) उपर्युक्त सभी
व्याख्या: समजात अंग वे अंग होते हैं जिनकी आधारभूत संरचना समान होती है, क्योंकि वे एक共同的 पूर्वज से विकसित हुए हैं, लेकिन उनके कार्य भिन्न-भिन्न हो सकते हैं।
(A) मानव का हाथ और कुत्ते का अग्रपाद दोनों में हड्डियों (प्रगंडिका, अर्धप्रगंडिका, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स, फैलेंजेस) की समान व्यवस्था है, पर कार्य अलग हैं।
(B) मानव और हाथी के दाँत भी समजात हैं, क्योंकि दोनों स्तनधारियों के दाँत हैं, हालाँकि आकार और कार्य में भिन्नता है।
(C) आलू का कंद (भोजन संग्रह) और घास का उपरिभूस्तारी (प्रकंद) दोनों तने के रूपांतर हैं, इसलिए ये भी समजात हैं।
अतः सभी विकल्प समजात अंगों के उदाहरण हैं।
प्रश्न 3. विकासीय दृष्टिकोण से हमारी किससे अधिक समानता है?
(A) चीन के विद्यार्थी
(B) चिम्पैंजी
(C) मकड़ी
(D) बैक्टीरिया
उत्तर: (A) चीन के विद्यार्थी
व्याख्या: विकासीय दृष्टिकोण से, दो जीवों के बीच समानता उनके विकासवादी इतिहास और आनुवंशिक निकटता पर निर्भर करती है। मनुष्य (होमो सेपियन्स) और चिम्पैंजी एक सामान्य पूर्वज साझा करते हैं, लेकिन वे अलग-अलग प्रजातियाँ हैं। वहीं, दुनिया के सभी मनुष्य (चाहे वे किसी भी देश के हों) एक ही प्रजाति के हैं और उनके बीच आनुवंशिक अंतर बहुत ही कम (99.9% से अधिक समानता) है। इसलिए, एक भारतीय विद्यार्थी की चीन के विद्यार्थी से आनुवंशिक और विकासवादी समानता चिम्पैंजी, मकड़ी या बैक्टीरिया की तुलना में बहुत अधिक है।
प्रश्न 4. जीवाश्म क्या है? यह किस प्रकार बनता है?
उत्तर: जीवाश्म प्राचीन काल के जीवों (पौधों या जंतुओं) के अवशेष, निशान या छाप होते हैं जो चट्टानों की परतों में संरक्षित पाए जाते हैं।
जीवाश्म बनने की प्रक्रिया: जीवाश्म बनने की सबसे सामान्य विधि शिलीभवन (Petrification) है। इस प्रक्रिया में निम्नलिखित चरण शामिल हैं:
1. दफन होना: जब कोई जीव मरता है, तो उसका शरीर तेजी से मिट्टी, रेत, गाद या कीचड़ से ढक जाता है। यह ढकना सड़न-गलन प्रक्रिया को धीमा कर देता है और शरीर को बाहरी कारकों (हवा, पानी, मांसाहारी जीव) से बचाता है।
2. खनिजीकरण: लाखों वर्षों तक दबे रहने के दौरान, भूमिगत जल उस अवशेष से होकर बहता है। यह पानी विभिन्न खनिजों (जैसे सिलिका, कैल्साइट, लौह यौगिक) से भरपूर होता है। ये खनिज धीरे-धीरे जीव के मूल कार्बनिक पदार्थ (जैसे हड्डी या लकड़ी) को प्रतिस्थापित कर देते हैं।
3. शिला में परिवर्तन: समय के साथ, वह तलछट दबकर और कठोर होकर चट्टान (जैसे अवसादी चट्टान) में बदल जाती है। खनिजीकृत अवशेष उस चट्टान का हिस्सा बन जाता है, जिसे हम जीवाश्म के रूप में खोदकर निकालते हैं।
जीवाश्म बनने की अन्य विधियों में हिमीकरण (जैसे मैमथ), एम्बर (राल) में संरक्षण और कोयले के रूप में संरक्षण (पौधों के लिए) शामिल हैं।
प्रश्न 5. मेंडल के प्रयोगों द्वारा कैसे पता चला कि लक्षण प्रभावी अथवा अप्रभावी होते हैं?
उत्तर: ग्रेगर जॉन मेंडल ने मटर के पौधों पर किए गए अपने संकरण प्रयोगों के माध्यम से यह निर्धारित किया कि कौन-सा लक्षण प्रभावी है और कौन-सा अप्रभावी। उनकी विधि इस प्रकार थी:
1. मेंडल ने शुद्ध नस्ल के विपरीत लक्षणों वाले पौधों (जैसे लम्बे vs बौने, बैंगनी पुष्प vs सफेद पुष्प) के बीच संकरण कराया। इन पौधों को Parental Generation (P) कहा गया।
2. इन संकरण से प्राप्त पहली संतति पीढ़ी को F1 पीढ़ी (First Filial Generation) कहा गया।
3. अवलोकन: मेंडल ने देखा कि F1 पीढ़ी के सभी पौधे केवल एक ही प्रकार का लक्षण दिखाते थे। उदाहरण के लिए, लम्बे और बौने पौधों के संकरण से प्राप्त सभी F1 पौधे लम्बे ही थे। बैंगनी और सफेद पुष्प वाले पौधों के संकरण से प्राप्त सभी F1 पौधों में बैंगनी पुष्प ही थे।
4. निष्कर्ष: इससे मेंडल ने यह समझा कि F1 पीढ़ी में जो लक्षण प्रकट हुआ (लम्बापन, बैंगनी पुष्प), वह प्रभावी लक्षण है। जो लक्षण F1 पीढ़ी में पूरी तरह से लुप्त हो गया (बौनापन, सफेद पुष्प), वह अप्रभावी लक्षण है।
5. पुष्टि: जब मेंडल ने F1 पीढ़ी के पौधों का आपस में स्व-परागण कराया तो F2 पीढ़ी में दोनों लक्षण (प्रभावी और अप्रभावी) फिर से प्रकट हुए। इससे पता चला कि अप्रभावी लक्षण का कारक (एलील) F1 पीढ़ी में मौजूद था, लेकिन प्रभावी एलील के कारण व्यक्त नहीं हो पा रहा था।
प्रश्न 6. जैव विकास को परिभाषित करें।
उत्तर: जैव विकास एक धीमी, सतत और स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सरल और आदिम जीवों में लंबे समय (करोड़ों वर्षों) में होने वाले आनुवंशिक परिवर्तनों के कारण जटिल और नई प्रजातियों का उद्भव होता है।
सरल शब्दों में: यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा पृथ्वी पर जीवन समय के साथ बदलता रहा है। आज हम जो विविध जीव देखते हैं, वे सभी पहले के सरल जीवों से विकसित हुए हैं। जैव विकास का मुख्य तंत्र प्राकृतिक चयन है, जिसमें पर्यावरण के अनुकूल लक्षण वाले जीव जीवित रहने और प्रजनन में सफल होते हैं, और उनके लक्षण अगली पीढ़ियों में संचरित होते हैं।
प्रश्न 7. विकास के पक्ष में पेश की जाने वाली आनुवंशिकी के अतिरिक्त कोई दो हल प्रस्तुत करें।
उत्तर: जैव विकास के पक्ष में प्रमाण के रूप में आनुवंशिकी (DNA समानता) के अलावा निम्नलिखित दो महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत किए जा सकते हैं:
1. समजात अंगों का अध्ययन: विभिन्न जीवों के ऐसे अंग जिनकी आधारभूत संरचना समान है, लेकिन कार्य भिन्न-भिन्न हैं, समजात अंग कहलाते हैं। उदाहरण: मनुष्य का हाथ, बिल्ली का अग्रपाद, चमगादड़ का पंख और व्हेल का फ्लिपर - इन सभी में हड्डियों (प्रगंडिका, अर्धप्रगंडिका, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स, फैलेंजेस) की संख्या और व्यवस्था समान है। यह समानता इस बात का प्रमाण है कि ये सभी जीव एक सामान्य पूर्वज से विकसित हुए हैं और विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल होने के लिए इन अंगों के कार्य बदल गए।
2. जीवाश्म अभिलेख: पृथ्वी की विभिन्न चट्टानी परतों में पाए जाने वाले जीवाश्म, जीवन के इतिहास की एक क्रमबद्ध रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। सबसे पुरानी परतों में सरल और आदिम जीवों के जीवाश्म मिलते हैं, जबकि नई परतों में जटिल जीवों के जीवाश्म मिलते हैं। इन जीवाश्मों के क्रमिक परिवर्तन (जैसे घोड़े के पूर्वज के आकार और पैर की उंगलियों में परिवर्तन) सीधे तौर पर यह दर्शाते हैं कि जीव समय के साथ कैसे बदले और विकसित हुए।
प्रश्न 8. मेंडल के प्रयोगों से प्राप्त परिणामों को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: मेंडल ने मटर के पौधों पर सात विपरीत लक्षणों (जैसे लम्बाई, बीज का रंग व आकार, पुष्प का रंग आदि) का अध्ययन किया। एक उदाहरण के माध्यम से उनके प्रयोगों के परिणामों को इस प्रकार समझा जा सकता है:
उदाहरण: लम्बे (T) और बौने (t) पौधों का संकरण
चरण 1 (P पीढ़ी): मेंडल ने शुद्ध लम्बे (TT) और शुद्ध बौने (tt) पौधों के बीच संकरण कराया।
चरण 2 (F1 पीढ़ी): इस संकरण से प्राप्त सभी संतति पौधे लम्बे (Tt) थे। यहाँ बौनापन प्रकट नहीं हुआ। इससे पता चला कि लम्बापन प्रभावी लक्षण है और बौनापन अप्रभावी लक्षण है।
चरण 3 (F2 पीढ़ी): जब F1 पीढ़ी के इन लम्बे पौधों (Tt) का आपस में स्व-परागण कराया गया, तो F2 पीढ़ी में लम्बे और बौने दोनों प्रकार के पौधे प्राप्त हुए।
परिणाम: F2 पीढ़ी में लम्बे और बौने पौधों का अनुपात लगभग 3:1 था। यानी हर तीन लम्बे पौधों के पीछे एक बौना पौधा था।
व्याख्या: इस 3:1 के अनुपात की व्याख्या मेंडल ने इस प्रकार की:
- F1 पीढ़ी के पौधे (Tt) दोनों प्रकार के युग्मक (T और t) बनाते हैं।
- यादृच्छिक निषेचन के कारण, F2 पीढ़ी में जीनोटाइप TT, Tt, tT और tt बनते हैं।
- TT, Tt और tT - ये तीनों लम्बे पौधे दिखाएंगे (क्योंकि T प्रभावी है)।
- केवल tt जीनोटाइप वाला पौधा बौना दिखाई देगा।
इस प्रकार, प्रभावी और अप्रभावी लक्षणों की पहचान, F1 पीढ़ी में केवल प्रभावी लक्षण का प्रकट होना, और F2 पीढ़ी में 3:1 का अनुपात मेंडल के प्रयोगों के मुख्य परिणाम थे, जिनसे आनुवंशिकी के नियम स्थापित हुए।
प्रश्न 9. लिंग सहलग्न रोग क्या हैं? दो लिंग सहलग्न रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर: लिंग सहलग्न रोग वे आनुवंशिक रोग हैं जो लिंग गुणसूत्रों (विशेष रूप से X गुणसूत्र) पर स्थित दोषपूर्ण जीन के कारण होते हैं और लिंग-सहलग्न तरीके से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होते हैं।
दो लिंग सहलग्न रोगों के नाम:
1. वर्णान्धता (Colour Blindness): इस रोग से पीड़ित व्यक्ति कुछ विशेष रंगों (जैसे लाल और हरा) में अंतर नहीं कर पाता। यह X गुणसूत्र पर स्थित अप्रभावी जीन के कारण होता है और पुरुषों में अधिक पाया जाता है।
2. हीमोफीलिया (Haemophilia): इस रोग में रक्त का थक्का जमने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे चोट लगने पर रक्तस्राव बहुत अधिक और लंबे समय तक होता है। यह भी X गुणसूत्र पर स्थित अप्रभावी जीन के कारण होता है और अधिकतर पुरुषों को प्रभावित करता है।
प्रश्न 10. वंशागति के नियमों की व्याख्या करें।
उत्तर: मेंडल द्वारा प्रतिपादित वंशागति (आनुवंशिकता) के मुख्य नियम निम्नलिखित हैं:
1. प्रभाविता का नियम (Law of Dominance): इस नियम के अनुसार, जब एक जोड़े के दो विपरीत (एलील) लक्षण एक साथ एक जीव में उपस्थित होते हैं, तो केवल एक ही लक्षण (प्रभावी लक्षण) स्वयं को व्यक्त करता है। दूसरा लक्षण (अप्रभावी लक्षण) छिपा रह जाता है और F1 पीढ़ी में प्रकट नहीं होता। उदाहरण: लम्बे (T) और बौने (t) पौधों के संकरण से F1 में सभी लम्बे (Tt) पौधे प्राप्त होते हैं, जहाँ लम्बापन प्रभावी है।
2. पृथक्करण का नियम (Law of Segregation): इस नियम के अनुसार, किसी भी लक्षण के लिए जिम्मेदार दोनों एलील (कारक) युग्मक निर्माण के समय एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं और अलग-अलग युग्मकों में चले जाते हैं। प्रत्येक युग्मक में उस लक्षण का केवल एक ही एलील होता है। निषेचन के समय ये युग्मक यादृच्छिक रूप से मिलकर संतति में नए जोड़े बनाते हैं। यही नियम F2 पीढ़ी में अप्रभावी लक्षण के पुनः प्रकट होने की व्याख्या करता है।
3. स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment): इस नियम के अनुसार, जब दो या दो से अधिक लक्षणों (जैसे बीज का आकार और रंग) का एक साथ अध्ययन किया जाता है, तो उनके एलील एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से अलग होते हैं और युग्मकों में स्वतंत्र रूप से संयोजित होते हैं। इससे संतति में लक्षणों के नए संयोग बनते हैं। यह नियम द्विसंकर संकरण के F2 पीढ़ी में 9:3:3:1 के अनुपात की व्याख्या करता है।
प्रश्न 12.
“केवल वे विभिन्नताएँ जो किसी एकल जीव (व्यष्टि) के लिए उपयोगी होती हैं, समष्टि में अपना अस्तित्व बनाए रखती हैं।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? क्यों एवं क्यों नहीं?
उत्तर:
हाँ, हम इस कथन से सहमत हैं। इसका कारण यह है कि प्रकृति में प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया काम करती है। जो विभिन्नताएँ (लक्षण) किसी जीव को अपने वातावरण में जीवित रहने और प्रजनन करने में मदद करती हैं, वे उपयोगी होती हैं। ऐसे जीव अधिक संख्या में जीवित रहते हैं और अपने उपयोगी लक्षणों को अगली पीढ़ी में स्थानांतरित करते हैं। इस तरह, समय के साथ पूरी आबादी (समष्टि) में ये उपयोगी विभिन्नताएँ हावी हो जाती हैं और उनका अस्तित्व बना रहता है। दूसरी ओर, जो विभिन्नताएँ उपयोगी नहीं हैं या हानिकारक हैं, उनके साथ वाले जीव प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं और धीरे-धीरे उनकी संख्या कम होती जाती है।
Bihar Board Class 10 Science Additional Important Questions and Answers
बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
आनुवंशिकता के प्रयोग के लिए मेण्डल ने निम्नलिखित में से कौन-से पौधों का उपयोग किया? (2016, 18)
(a) पपीता
(b) आलू
(c) मटर
(d) अंगूर
उत्तर: (c) मटर
प्रश्न 2.
विपरीत लक्षणों के जोड़ों को कहते हैं - (2013)
(a) युग्मविकल्पी या एलिलोमॉर्फ
(b) निर्धारक
(c) समयुग्मजी
(d) समरूप
उत्तर: (a) युग्मविकल्पी या एलिलोमॉर्फ
प्रश्न 3.
मटर में बीजों का गोल आकार तथा पीला रंग दोनों होते हैं -
(a) अप्रभावी
(b) अपूर्ण प्रभावी
(c) संकर
(d) प्रभावी
उत्तर: (d) प्रभावी
प्रश्न 4.
उद्यान मटर में अप्रभावी लक्षण है - (2015, 16)
(a) लम्बे तने
(b) झुर्रीदार बीज
(c) गोल बीज
(d) फैली हुई फली
उत्तर: (b) झुर्रीदार बीज
प्रश्न 5.
एकसंकर संकरण के F2 पीढ़ी में शुद्ध तथा संकर लक्षणों वाले पौधों का अनुपात होगा
(a) 2 : 1
(b) 3 : 1
(c) 1 : 1
(d) 1 : 3
उत्तर: (c) 1 : 1
प्रश्न 6.
एक संकर क्रॉस का जीन प्रारूप अनुपात होता है -
(a) 3 : 1
(b) 1 : 2 : 1
(c) 2 : 1 : 2
(d) 9 : 3 : 3 : 1
उत्तर: (b) 1 : 2 : 1
प्रश्न 7.
मटर के लम्बे पौधों का क्रॉस बौने पौधों से कराने पर प्रथम पीढ़ी में लम्बे मटर के पौधे प्राप्त होते हैं, द्वितीय पीढ़ी में प्राप्त पौधे होंगे (2017)
(a) लम्बे तथा बौने दोनों
(b) लम्बे मटर के पौधे
(c) बौने मटर के पौधे
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर: (a) लम्बे तथा बौने दोनों
प्रश्न 8.
F2 पीढ़ी में 3 : 1 अनुपात प्राप्त होता है - (2015)
(a) एक संकर क्रॉस में
(b) द्विसंकर क्रॉस में
(c) (a) तथा (b) दोनों में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर: (a) एक संकर क्रॉस में
प्रश्न 9.
पृथक्करण का नियम प्रस्तुत किया था - (2012, 14)
(a) चार्ल्स डार्विन ने
(b) ह्यूगो डी वीज ने
(c) जॉन ग्रेगर मेण्डल ने
(d) राबर्ट हुक ने
उत्तर: (c) जॉन ग्रेगर मेण्डल ने।
प्रश्न 10.
गुणसूत्र किस पदार्थ के बने होते हैं? (2013)
(a) प्रोटीन
(b) आर०एन०ए०
(c) डी०एन०ए०
(d) डी०एन०ए० और प्रोटीन
उत्तर: (d) डी०एन०ए० और प्रोटीन
प्रश्न 11.
मनुष्य में कौन-सा गुणसूत्र जोड़ा स्त्रीलिंग निर्धारण करता है?
(a) XY
(b) Xx
(c) XXY
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर: (b) Xx
प्रश्न 12.
सामान्य मनुष्य में गुणसूत्रों की संख्या है -
(a) 45
(b) 46
(c) 30
(d) 23
उत्तर: (b) 46
प्रश्न 13.
मनुष्य के शुक्राणु में ऑटोसोम की संख्या कितनी होती है? (2016)
(a) 22
(b) 24
(c) 42
(d) 44
उत्तर: (a) 22
प्रश्न 14.
मनुष्य में लड़का पैदा होगा जब -
(a) माँ का पोषण गर्भावस्था में अधिक पौष्टिक हो
(b) पिता माँ से अधिक शक्तिशाली हो
(c) बच्चे में XY गुणसूत्र हों
(d) बच्चे में XX गुणसूत्र हों
उत्तर: (c) बच्चे में XY गुणसूत्र हों
प्रश्न 15.
लक्षण, जिनके जीन्स गुणसूत्रों पर होते हैं, कहलाते हैं। (2011)
(a) लिंग प्रभावित
(b) लिंग सहलग्न
(c) लिंग सीमित
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर: (b) लिंग सहलग्न
प्रश्न 16.
जीवन की उत्पत्ति हुई - (2012)
(a) सागर में
(b) धरती पर
(c) वायुमण्डल में
(d) अंतरिक्ष में
उत्तर: (a) सागर में
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
आनुवंशिकता की खोज करने वाले वैज्ञानिक का पूरा नाम बताइये। या आनुवंशिकता के जनक का नाम बताइये। या आनुवंशिकता के जन्मदाता कौन थे? (2012, 13)
उत्तर:
आनुवंशिकता के जनक ग्रेगर जॉन मेण्डल थे। उन्होंने ही सबसे पहले मटर के पौधों पर प्रयोग करके आनुवंशिकता के नियमों की खोज की।
प्रश्न 2.
मेण्डल ने आनुवंशिकता का प्रयोग किस पौधे पर किया था? उसका वैज्ञानिक नाम लिखिए। (2018)
उत्तर:
मेण्डल ने अपने प्रयोग के लिए मटर के पौधे को चुना। इसका वैज्ञानिक नाम पाइसम सैटाइवम (Pisum sativum) है।
प्रश्न 3.
मेण्डल ने अपने प्रयोग के लिए मटर के पौधे को क्यों चुना? (2017)
उत्तर:
मेण्डल ने अपने प्रयोग के लिए मटर के पौधे को निम्नलिखित कारणों से चुना:
1. मटर का जीवनचक्र छोटा होता है, जिससे एक वर्ष में कई पीढ़ियों का अध्ययन किया जा सकता है।
2. इनमें स्व-परागण की प्रवृत्ति होती है, जिससे शुद्ध नस्लें आसानी से तैयार की जा सकती हैं।
3. इनमें स्पष्ट और विपरीत लक्षण (जैसे लम्बा/बौना, गोल/झुर्रीदार बीज) पाए जाते हैं, जिनका अध्ययन करना आसान है।
4. इन्हें उगाना और देखभाल करना सरल है तथा ये कम जगह में उगाए जा सकते हैं।
प्रश्न 4.
प्रभावी तथा अप्रभावी लक्षणों से आप क्या समझते हैं? (2017)
उत्तर:
प्रभावी लक्षण: वह लक्षण जो संकर (F1) पीढ़ी में स्वयं को प्रकट कर लेता है, प्रभावी लक्षण कहलाता है। उदाहरण के लिए, मटर में लम्बापन और गोल बीज प्रभावी लक्षण हैं।
अप्रभावी लक्षण: वह लक्षण जो संकर (F1) पीढ़ी में प्रकट नहीं होता, बल्कि छिपा रहता है और अगली (F2) पीढ़ी में कुछ अनुपात में दिखाई देता है, अप्रभावी लक्षण कहलाता है। उदाहरण के लिए, मटर में बौनापन और झुर्रीदार बीज अप्रभावी लक्षण हैं।
प्रश्न 5.
लक्षणरूपी 9:3:3:1 मेण्डल के किस नियम का प्रतिपादन करता है?
उत्तर:
लक्षणरूपी अनुपात 9:3:3:1, मेण्डल के स्वतंत्र अपव्यूहन के नियम (Law of Independent Assortment) का प्रतिपादन करता है। यह नियम बताता है कि दो अलग-अलग लक्षणों के जोड़े (जैसे बीज का आकार और रंग) वंशानुगत होते समय एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से व्यवहार करते हैं।
प्रश्न 6.
मनुष्य के नर तथा मादा गुणसूत्रों को प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर:
नर: 44 ऑटोसोम + XY लिंग गुणसूत्र (कुल 46 गुणसूत्र)।
मादा: 44 ऑटोसोम + XX लिंग गुणसूत्र (कुल 46 गुणसूत्र)।
प्रश्न 7.
यदि किसी जीव की कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या 20 है, तो उसकी जनन कोशिकाओं में कितने गुणसूत्र होंगे?
उत्तर:
यदि किसी जीव की दैहिक (शरीर) कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या 20 (यानी 2n = 20) है, तो उसकी जनन कोशिकाओं (युग्मकों - शुक्राणु या अंडाणु) में गुणसूत्रों की संख्या आधी यानी 10 (n = 10) होगी। ऐसा अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) की प्रक्रिया के कारण होता है, जिसमें गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है।
प्रश्न 8. प्रोकेरियोटिक कोशिकाओं में डी०एन०ए० कहाँ पाया जाता है? (2013)
प्रोकेरियोटिक कोशिकाओं (जैसे जीवाणु) में एक सुस्पष्ट केन्द्रक नहीं होता। इनमें डीएनए (आनुवंशिक पदार्थ) कोशिकाद्रव्य में ही एक लंबे, गोलाकार, बंद गुणसूत्र के रूप में स्वतंत्र रूप से पड़ा रहता है। इसे न्यूक्लियॉइड क्षेत्र कहते हैं।
प्रश्न 9. आनुवंशिक रोग किसे कहते हैं?
वे रोग जो माता-पिता से सन्तान में जीन के माध्यम से स्थानांतरित होते हैं, आनुवंशिक रोग कहलाते हैं। ये रोग गुणसूत्रों या जीनों में होने वाली असामान्यताओं (जैसे जीन में परिवर्तन, गुणसूत्रों की संख्या या संरचना में बदलाव) के कारण उत्पन्न होते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशानुगत हो सकते हैं। उदाहरण: वर्णान्धता, हीमोफीलिया, सिकल सेल एनीमिया।
प्रश्न 10. किस आनुवंशिक लक्षण के जीन्स x ITE Ue पाये जाते हैं? (2011)
वर्णान्धता (कलर ब्लाइंडनेस)। इस रोग के जीन्स X गुणसूत्र पर स्थित होते हैं, इसलिए यह एक लिंग-सहलग्न (X-linked) रोग है।
प्रश्न 11. यदि किसी व्यक्ति को हल्की चोट लगने पर भी रक्तस्राव नहीं रुकता तो उसे कौन-सा रोग हो सकता है?
ऐसे व्यक्ति को हीमोफीलिया नामक आनुवंशिक रोग हो सकता है। इस रोग में रक्त का थक्का जमने के लिए आवश्यक प्रोटीन (क्लॉटिंग फैक्टर) की कमी होती है, जिससे चोट लगने पर रक्तस्राव जल्दी नहीं रुकता।
प्रश्न 12. लिंग सहलग्नता से सम्बन्धित किन्हीं दो बीमारियों के नाम लिखिए। (2013, 15, 18)
लिंग सहलग्नता से सम्बन्धित दो प्रमुख बीमारियाँ हैं:
- हीमोफीलिया
- वर्णान्धता (कलर ब्लाइंडनेस)
प्रश्न 13. एक व्यक्ति हीमोफीलिया का रोगी है और उसकी पत्नी में हीमोफीलिया का एक जीन है। उस दंपत्ति के बच्चों में रोग से ग्रसित होने की संभावना क्या होगी? (2013)
हीमोफीलिया एक लिंग-सहलग्न (X गुणसूत्र पर) अप्रभावी रोग है।
पिता का जीनोटाइप: XhY (रोगी, क्योंकि उसके पास दोषपूर्ण X गुणसूत्र है)।
माता का जीनोटाइप: XHXh (वाहक, क्योंकि उसमें एक सामान्य और एक दोषपूर्ण जीन है)।
संतानों में संभावनाएं:
50% पुत्र: इनमें से आधे (25%) सामान्य (XHY) और आधे (25%) रोगी (XhY) होंगे।
50% पुत्रियाँ: इनमें से आधी (25%) वाहक (XHXh) और आधी (25%) रोगी (XhXh) होंगी।
अतः, कुल मिलाकर सभी बच्चों (पुत्र+पुत्री) में से 50% बच्चों के रोगी होने की संभावना है।
प्रश्न 14. यदि किसी बच्चे में 46 के स्थान पर 47 गुणसूत्र हों, तो उस बच्चे में किस प्रकार के रोग होने की सम्भावना है? या एक बच्चे में 47 गुणसूत्र हैं। उसे किस रोग की सम्भावना है?
मानव में सामान्यतः प्रत्येक कोशिका में 46 (23 जोड़े) गुणसूत्र होते हैं। यदि किसी बच्चे में 47 गुणसूत्र हैं, तो यह गुणसूत्र संख्या में अनियमितता दर्शाता है। ऐसी स्थिति में डाउन सिंड्रोम (मंगोलिज्म या मंगोली जड़ता) नामक रोग होने की प्रबल सम्भावना रहती है। यह रोग 21वें गुणसूत्र के एक अतिरिक्त होने (ट्राइसोमी-21) के कारण होता है। इस रोग से ग्रसित बच्चों में शारीरिक व मानसिक विकास मंद होता है।
प्रश्न 15. मानव आनुवंशिकी विशेषकों से क्या तात्पर्य है?
मानव आनुवंशिकी विशेषकों से तात्पर्य उन सभी लक्षणों या गुणों से है जो मनुष्य में उसके माता-पिता से जीन के द्वारा प्राप्त होते हैं और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होते रहते हैं। उदाहरण के लिए: आँखों का रंग, बालों का प्रकार, कद, रक्त समूह, तथा कुछ विशेष रोगों के प्रति संवेदनशीलता आदि।
प्रश्न 16. स्वत: जनन सिद्धान्त में विश्वास रखने वाले किसी एक वैज्ञानिक का नाम बताइये। या स्वतः जननवाद मत के प्रवर्तक का नाम लिखिये।
स्वतः जनन (अलैंगिक जनन से भिन्न) के पुराने सिद्धांत में विश्वास रखने वाले एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक बैप्टिस्ट वॉन हेलमॉन्ट (1652) थे। उनका मानना था कि गंदे कपड़ों और गेहूं के दानों से चूहे स्वतः उत्पन्न हो सकते हैं।
प्रश्न 17. मिलर ने अपने प्रयोग में कौन-कौन सी गैसों का मिश्रण लिया?
स्टेनली मिलर और हेरोल्ड यूरे ने 1953 में पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति का अनुकरण करने वाले अपने प्रसिद्ध प्रयोग में निम्नलिखित गैसों का मिश्रण लिया, जो आदिम वायुमंडल में उपस्थित मानी जाती थीं:
- मीथेन (CH4)
- अमोनिया (NH3)
- हाइड्रोजन (H2)
- जलवाष्प (H2O)
प्रश्न 18. जीवन के उद्भव का आधुनिक ओपेरिन सिद्धान्त क्या है ? (2011, 13)
रूस के जीवरसायनज्ञ ए. आई. ओपेरिन (1924) और इंग्लैंड के जे. बी. एस. हाल्डेन ने जीवन की उत्पत्ति का आधुनिक रासायनिक सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसे ओपेरिन-हाल्डेन सिद्धांत भी कहते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार:
- आदिकालीन पृथ्वी के वायुमंडल में मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन और जलवाष्प जैसी अकार्बनिक गैसें थीं।
- विद्युत तड़ित, पराबैंगनी विकिरण और उच्च ताप जैसी ऊर्जा स्रोतों के प्रभाव से ये गैसें आपस में अभिक्रिया करके सरल कार्बनिक यौगिक (जैसे शर्करा, अमीनो अम्ल) बनाती थीं।
- ये यौगिक वर्षा के साथ समुद्र में एकत्र होते गए और लाखों वर्षों में एक "ऑर्गेनिक सूप" या "उष्ण तरल सूप" बन गया।
- इन कार्बनिक अणुओं के संयोग से बड़े अणु (प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल) और अंततः कोएसरवेट बूंदें (पृथक्कृत कोलॉइडी संरचनाएँ) बनीं, जो जीवन की प्रारंभिक इकाई मानी जाती हैं।
- धीरे-धीरे इन संरचनाओं में स्व-प्रतिकृति और चयापचय जैसे जैविक गुण विकसित हुए और अंततः सरल कोशिकाओं का निर्माण हुआ।
प्रश्न 1. आनुवंशिकता को परिभाषित कीजिए। इसकी खोज कब और किसने की? (2011, 17)
आनुवंशिकता वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीवों के लक्षण या गुण (जैसे रंग-रूप, आकार, कुछ व्यवहार) माता-पिता से उनकी सन्तान में जीन के माध्यम से स्थानांतरित होते हैं। इसी के कारण प्रत्येक जीव की सन्तान उसी जाति का होता है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी समानता बनी रहती है।
आनुवंशिकता के अध्ययन की शाखा को आनुवंशिकी (Genetics) कहते हैं। इसकी नींव ग्रेगर जॉन मेंडल ने सन् 1866 में मटर के पौधों पर किए गए अपने प्रयोगों के आधार पर रखी। इसलिए उन्हें 'आनुवंशिकी का जनक' कहा जाता है।
प्रश्न 2, मानव आनुवंशिकी से आप क्या समझते हैं? इसके जनक कौन थे? इसके क्या लाभ हैं? (2013)
मानव आनुवंशिकी आनुवंशिकी की वह शाखा है जिसमें मनुष्यों में वंशागत लक्षणों, उनके स्थानांतरण के नियमों और आनुवंशिक रोगों का अध्ययन किया जाता है।
जनक: मानव आनुवंशिकी के जनक सर फ्रांसिस गाल्टन (1822-1911) माने जाते हैं।
लाभ:
- आनुवंशिक रोगों की पहचान व रोकथाम: थैलेसीमिया, हीमोफीलिया, डाउन सिंड्रोम जैसे रोगों का गर्भावस्था में ही पता लगाकर उचित परामर्श दिया जा सकता है।
- सुजननिकी (Eugenics): समाज में अच्छे आनुवंशिक गुणों को बढ़ावा देने और हानिकारक गुणों को कम करने के लिए जागरूकता फैलाना।
- वंशावली अध्ययन: परिवार में फैलने वाले रोगों के पैटर्न को समझकर भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षित रखना।
- फोरेंसिक विज्ञान: अपराध स्थल से प्राप्त डीएनए का विश्लेषण कर अपराधी की पहचान में सहायता करना।
- जीन थेरेपी: भविष्य में दोषपूर्ण जीन को स्वस्थ जीन से बदलकर आनुवंशिक रोगों का इलाज संभव हो सकता है।
प्रश्न 3. आनुवंशिकी के गुणसूत्र सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। (2017)
गुणसूत्र सिद्धांत आनुवंशिकी का एक मौलिक सिद्धांत है जिसे सटन और बोवेरी ने प्रतिपादित किया। इस सिद्धांत के प्रमुख बिंदु हैं:
- जीन, आनुवंशिकता की मूल इकाइयाँ, गुणसूत्रों पर स्थित होती हैं।
- प्रत्येक जीन गुणसूत्र पर एक विशिष्ट स्थान (लोकस) पर स्थित होता है।
- गुणसूत्रों के व्यवहार (विभाजन के दौरान) से मेंडल के वंशागति के नियमों की व्याख्या की जा सकती है।
- कोशिका में गुणसूत्र जोड़े (होमोलॉगस जोड़े) के रूप में होते हैं, जिनमें से एक माता से और एक पिता से आता है।
- युग्मक निर्माण (अर्धसूत्री विभाजन) के समय गुणसूत्रों के जोड़े अलग हो जाते हैं, इसलिए प्रत्येक युग्मक में प्रत्येक गुणसूत्र-जोड़े का केवल एक-एक गुणसूत्र होता है।
- निषेचन के समय नर व मादा युग्मकों के संलयन से गुणसूत्रों के जोड़े पुनः स्थापित हो जाते हैं, जिससे सन्तान में माता-पिता दोनों के लक्षण आते हैं।
- गुणसूत्र ही वाहक हैं जो आनुवंशिक सूचना (जीन) को एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक पहुँचाते हैं।
प्रश्न 4. एकसंकर तथा द्विसंकर क्रॉस से आप क्या समझते हैं? उदाहरण देते हुए समझाइए। (2015, 17)
एकसंकर संकरण (Monohybrid Cross): जब दो जनक पौधों के बीच केवल एक ही विपर्यासी लक्षण (जैसे लम्बा vs बौना) के आधार पर संकरण कराया जाता है, तो उसे एकसंकर संकरण कहते हैं।
उदाहरण: मेंडल ने लम्बे (TT) और बौने (tt) मटर के पौधों का संकरण कराया। F1 पीढ़ी में सभी पौधे लम्बे (Tt) थे। F1 पीढ़ी के स्वपरागण से F2 पीढ़ी में 3 लम्बे : 1 बौना का अनुपात प्राप्त हुआ।
द्विसंकर संकरण (Dihybrid Cross): जब दो जनक पौधों के बीच दो विभिन्न विपर्यासी लक्षणों (जैसे बीज का आकार गोल vs झुर्रीदार और बीज का रंग पीला vs हरा) के आधार पर संकरण कराया जाता है, तो उसे द्विसंकर संकरण कहते हैं।
उदाहरण: मेंडल ने गोल-पीले बीज (RRYY) वाले और झुर्रीदार-हरे बीज (rryy) वाले पौधों का संकरण कराया। F1 पीढ़ी में सभी पौधे गोल-पीले (RrYy) थे। F1 के स्वपरागण से F2 पीढ़ी में 9 गोल-पीले : 3 गोल-हरे : 3 झुर्रीदार-पीले : 1 झुर्रीदार-हरे का अनुपात प्राप्त हुआ। यह 9:3:3:1 का द्विसंकर अनुपात है।
अध्याय 9: अनुवांशिकता एवं जैव विकास
1. मेंडल के प्रयोगों द्वारा कैसे पता चला कि लक्षण प्रभावी अथवा अप्रभावी हो सकते हैं?
मेंडल ने मटर के पौधों पर किए गए अपने प्रयोगों में विभिन्न लक्षणों (जैसे लंबाई, बीज का रंग) के जोड़े लिए। जब उन्होंने शुद्ध लंबे (TT) और शुद्ध बौने (tt) पौधों का संकरण किया, तो पहली पीढ़ी (F1) के सभी पौधे लंबे (Tt) प्राप्त हुए। इससे पता चला कि लंबापन लक्षण प्रकट हुआ, अर्थात यह प्रभावी लक्षण है। जब F1 पीढ़ी के पौधों का स्वपरागण कराया गया, तो दूसरी पीढ़ी (F2) में लंबे और बौने पौधे 3:1 के अनुपात में प्राप्त हुए। बौनापन F1 पीढ़ी में प्रकट नहीं हुआ था, लेकिन F2 में दिखाई दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि बौनापन अप्रभावी लक्षण था जो F1 में छिपा रहा और F2 में कुछ संतानों में प्रकट हुआ।
2. एक ‘जीन’ को परिभाषित कीजिए।
जीन डीएनए (आनुवंशिक पदार्थ) का वह खंड या इकाई है जो किसी विशिष्ट प्रोटीन के संश्लेषण के लिए आनुवंशिक सूचना रखता है। प्रत्येक जीन किसी विशेष आनुवंशिक लक्षण (जैसे आँखों का रंग, बालों का प्रकार) को नियंत्रित करने के लिए उत्तरदायी होता है। जीन गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं और माता-पिता से संतानों में स्थानांतरित होते हैं।
3. आनुवंशिकता के अध्ययन में मेंडल के प्रयोगों का महत्त्व क्या है?
मेंडल के प्रयोग आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) के आधार के रूप में माने जाते हैं। उनके प्रयोगों का महत्त्व इस प्रकार है:
1. उन्होंने प्रभावी और अप्रभावी लक्षणों की अवधारणा दी।
2. उन्होंने यह दिखाया कि लक्षण स्वतंत्र इकाइयों (जीन) द्वारा नियंत्रित होते हैं जो युग्मकों के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होते हैं।
3. उन्होंने संकरण के नियम, जैसे प्रभाविता का नियम और पृथक्करण का नियम प्रतिपादित किए।
4. उन्होंने गणितीय अनुपात (जैसे 3:1) का उपयोग करके आनुवंशिक परिणामों की भविष्यवाणी करने का मार्ग प्रशस्त किया।
5. उनके कार्य ने आधुनिक आनुवंशिकी की नींव रखी, भले ही उनके जीवनकाल में इसकी सराहना नहीं हुई।
4. यदि एक ‘संकर लंबे’ पौधे का परागण संकर लंबे पौधे से कराया जाए तो संतति में कौन-कौन से विभिन्न प्रकार के जीन प्ररूप और लक्षण प्ररूप बनेंगे? संतति का मेन्डेलियन अनुपात भी बताइए।
यहाँ 'संकर लंबा' पौधा जीन प्ररूप Tt (जहाँ T=लंबा, प्रभावी और t=बौना, अप्रभावी) वाला होता है।
संकरण: Tt (संकर लंबा) × Tt (संकर लंबा)
युग्मक: दोनों पौधे T और t युग्मक बनाते हैं।
संभावित संतति (पुनेट वर्ग द्वारा):
- TT (शुद्ध लंबा) – 1 भाग
- Tt (संकर लंबा) – 2 भाग
- tt (शुद्ध बौना) – 1 भाग
जीन प्ररूप अनुपात: TT : Tt : tt = 1 : 2 : 1
लक्षण प्ररूप (फीनोटाइप):
- लंबे पौधे (TT + Tt) – 3 भाग
- बौने पौधे (tt) – 1 भाग
लक्षण प्ररूप अनुपात: लंबा : बौना = 3 : 1
यह मेंडल का प्रसिद्ध F2 पीढ़ी का अनुपात है।
5. विकासीय संबंध क्या दर्शाते हैं?
विकासीय संबंध यह दर्शाते हैं कि विभिन्न जीव, चाहे वे कितने भी भिन्न दिखें, एक सामान्य पूर्वज से उत्पन्न हुए हैं। ये संबंध जीवों के बीच समानताओं और असमानताओं के आधार पर स्थापित किए जाते हैं, जैसे:
1. समजात अंग: वे अंग जो आकारिकी (संरचना) में समान होते हैं लेकिन कार्य भिन्न होते हैं (जैसे मनुष्य का हाथ, चमगादड़ का पंख, व्हेल का अग्रपंख)। ये एक सामान्य पूर्वज की ओर संकेत करते हैं।
2. समरूप अंग: वे अंग जो कार्य में समान होते हैं लेकिन संरचना एवं उद्भव में भिन्न होते हैं (जैसे तितली और पक्षी के पंख)। ये समान वातावरणीय दबाव के कारण हुए अभिसारी विकास को दर्शाते हैं।
3. जीवाश्म अभिलेख: ये पृथ्वी पर जीवन के इतिहास और विभिन्न जीवों के बीच संबंधों को दर्शाते हैं।
4. भ्रूणीय समानताएँ: विभिन्न कशेरुकी जीवों के भ्रूण प्रारंभिक अवस्था में बहुत समान दिखते हैं, जो उनके सामान्य विकासीय इतिहास को प्रमाणित करता है।
6. क्या भिन्न-भिन्न स्थानों पर पाए जाने वाले एक ही जीव के जीवाश्मों से कोई संबंध बनता है? यदि हाँ, तो कैसे?
हाँ, भिन्न-भिन्न स्थानों पर पाए जाने वाले एक ही जीव के जीवाश्मों के बीच घनिष्ठ संबंध बनता है। यह संबंध निम्न प्रकार से स्थापित होता है:
1. विकास की कड़ी: विभिन्न स्थानों से प्राप्त जीवाश्म, जब कालक्रम के अनुसार व्यवस्थित किए जाते हैं, तो वे एक जीव के विकासीय क्रम को दर्शा सकते हैं। उदाहरण के लिए, घोड़े के विभिन्न पूर्वजों के जीवाश्म विश्व के अलग-अलग हिस्सों से मिले हैं, जो उसके आकार, पैरों की संरचना आदि में हुए परिवर्तनों को दर्शाते हैं।
2. महाद्वीपीय विस्थापन: एक ही जीव के जीवाश्म अलग-अलग महाद्वीपों पर मिलना इस बात का प्रमाण हो सकता है कि कभी वे सभी भूभाग एक विशाल भूखंड (जैसे पैंजिया) का हिस्सा थे। जब महाद्वीप अलग हुए, तो जीव अलग-अलग क्षेत्रों में फैल गए और वहाँ जीवाश्म के रूप में संरक्षित हो गए।
3. पर्यावरणीय परिवर्तनों का अध्ययन: विभिन्न स्थानों के जीवाश्म बताते हैं कि कैसे जलवायु और भूगोल में परिवर्तन के साथ जीवों ने स्वयं को ढाला या विलुप्त हुए।
इस प्रकार, भौगोलिक रूप से अलग-अलग जीवाश्म एक ही विकासीय कहानी के अलग-अलग अध्यायों की तरह हैं, जो जीवन के इतिहास को जोड़ते हैं।
7. विकास के प्रमाण के रूप में जीवाश्मों का क्या महत्त्व है?
जीवाश्म विकास के सबसे मजबूत और प्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान करते हैं। उनका महत्त्व इस प्रकार है:
1. प्राचीन जीवन का अभिलेख: जीवाश्म पृथ्वी पर करोड़ों वर्ष पहले रहने वाले जीवों के शारीरिक अवशेष या चिह्न हैं, जो हमें प्राचीन जीवन के बारे में जानकारी देते हैं।
2. विकासीय क्रम दिखाना: विभिन्न भूवैज्ञानिक परतों से प्राप्त जीवाश्म एक जीव के विकास के क्रमिक परिवर्तनों को दर्शाते हैं। उदाहरण: घोड़े के पूर्वजों के जीवाश्म उसके आकार में वृद्धि और पैर की उंगलियों की संख्या में कमी (चार से एक) का क्रम दिखाते हैं।
3. विलुप्त जीवों के बारे में जानकारी: जीवाश्म उन जीवों के बारे में बताते हैं जो आज विलुप्त हो चुके हैं, जैसे डायनासोर। यह समझने में मदद करता है कि किन कारणों से जीवों का विलोपन हुआ।
4. समयरेखा निर्धारण: जीवाश्मों की आयु निर्धारण (कार्बन डेटिंग आदि) से पृथ्वी पर जीवन के इतिहास की एक समयरेखा बनाने में मदद मिलती है।
5. अंतराल पूर्ति: कभी-कभी 'जीवाश्म कड़ियों' की कमी होती है, लेकिन नए जीवाश्मों की खोज से विकासीय पहेलियों के टुकड़े जुड़ते हैं और विकास की कहानी और स्पष्ट होती है।
8. विकास को परिभाषित कीजिए।
विकास वह धीमी, सतत और लंबी प्रक्रिया है जिसके द्वारा सरल संरचना वाले जीवों से, लाखों-करोड़ों वर्षों में, विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल होते हुए, अधिक जटिल संरचना वाले जीवों का निर्माण हुआ है। दूसरे शब्दों में, यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी होने वाले आनुवंशिक परिवर्तनों का संचय है, जिसके परिणामस्वरूप जीवों की नई प्रजातियों का उद्भव होता है। विकास का मुख्य तंत्र प्राकृतिक वरण है।
9. हमारे विश्व में उपस्थित असंख्य जातियों के बारे में डार्विन के विचारों को संक्षेप में बताइए।
चार्ल्स डार्विन ने अपनी पुस्तक 'ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज' (1859) में प्राकृतिक वरण द्वारा विकास के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। विश्व की असंख्य जातियों (प्रजातियों) के बारे में उनके मुख्य विचार इस प्रकार हैं:
1. जनसंख्या में विभिन्नता: किसी भी जीवों की आबादी के सदस्य एक-दूसरे से पूर्णतः समान नहीं होते; उनमें आकार, रंग, व्यवहार आदि में विभिन्नताएँ होती हैं। ये विभिन्नताएँ आनुवंशिक होती हैं और संतानों में स्थानांतरित हो सकती हैं।
2. अस्तित्व के लिए संघर्ष: संसाधन (भोजन, स्थान, जल) सीमित होते हैं, जबकि जीवों की संख्या बढ़ने की क्षमता असीमित होती है। इससे जीवों के बीच अस्तित्व के लिए संघर्ष होता है।
3. प्राकृतिक वरण: उन विभिन्नताओं वाले जीव, जो अपने पर्यावरण के लिए सबसे अधिक अनुकूलित (फिट) होते हैं, अस्तित्व के संघर्ष में बच जाते हैं और अधिक संतान पैदा करते हैं। इस प्रकार, अनुकूल लक्षण समय के साथ आबादी में बढ़ जाते हैं। इस प्रक्रिया को प्राकृतिक वरण कहते हैं।
4. नई प्रजातियों का उद्भव: लंबे समय तक प्राकृतिक वरण की यह प्रक्रिया चलती रहने से, जीवों में इतने परिवर्तन आ जाते हैं कि वे मूल प्रजाति से भिन्न हो जाते हैं और अंततः नई प्रजातियाँ बन जाती हैं। इस प्रकार, सभी जातियाँ एक सामान्य पूर्वज से विकसित हुई हैं।
10. विकासीय उद्देश्य से हमारी क्या विशेष सोच होनी चाहिए?
विकासीय दृष्टिकोण से हमारी सोच में निम्नलिखित बातें शामिल होनी चाहिए:
1. सभी जीवों का आपसी संबंध: हमें यह समझना चाहिए कि पृथ्वी पर मौजूद सभी जीव (पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव) एक-दूसरे से और अपने पर्यावरण से जुड़े हुए हैं। हम सभी एक लंबे विकासीय इतिहास की उपज हैं।
2. परिवर्तन सतत प्रक्रिया है: विकास एक रुकी हुई प्रक्रिया नहीं है; यह लगातार जारी है। जीव नए पर्यावरणीय दबावों के अनुसार स्वयं को बदलते रहते हैं।
3. मानव की जिम्मेदारी: चूंकि मनुष्य ने बुद्धि और तकनीक से स्वयं को विकसित किया है, इसलिए उसकी यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वह अन्य जीवों और पारिस्थितिकी तंत्र के विकास में बाधा न डाले। हमें जैव विविधता का संरक्षण करना चाहिए।
4. वैज्ञानिक साक्ष्यों का सम्मान: विकास के सिद्धांत को समझने के लिए जीवाश्म, समजात अंग, आनुवंशिकी आदि के वैज्ञानिक प्रमाणों को महत्त्व देना चाहिए, न कि अफवाहों या गलत धारणाओं को।
5. विनम्र दृष्टिकोण: हमें यह सोचना चाहिए कि मनुष्य जैव विकास की श्रृंखला का अंतिम पड़ाव नहीं है। भविष्य में और भी परिवर्तन संभव हैं।
अध्याय 9: अनुवांशिकता एवं जैव विकास
1. मेण्डल के एक प्रयोग में लम्बे मटर के पौधे जिनके बैंगनी पुष्प थे, का संकरण बौने पौधों जिनके सफेद पुष्प थे, से कराया गया। इनकी संतति के सभी पौधों में पुष्प बैंगनी रंग के थे परन्तु आधे बौने थे। इससे कहा जा सकता है कि लम्बे जनक पौधों की आनुवंशिक रचना निम्न थी-
(a) TTWW
(b) TTww
(c) TtWW
(d) TtWw
उत्तर: (c) TtWW
व्याख्या: मेण्डल के इस प्रयोग में, लम्बापन प्रभावी लक्षण (T) और बौनापन अप्रभावी (t) है। इसी तरह, बैंगनी पुष्प प्रभावी (W) और सफेद पुष्प अप्रभावी (w) हैं। चूँकि सभी संतति पौधों में बैंगनी पुष्प थे, इसका मतलब है कि लम्बे जनक (बैंगनी पुष्प वाले) में सफेद पुष्प के लिए कोई अप्रभावी जीन (w) नहीं था। वह शुद्ध प्रभावी (WW) था। लेकिन लम्बे जनक से आधी संतति बौनी थी, जो दर्शाता है कि लम्बे जनक में लम्बेपन के लिए एक प्रभावी और एक अप्रभावी जीन (Tt) मौजूद था। इसलिए, लम्बे जनक की आनुवंशिक रचना TtWW थी।
2. समजात अंग का उदाहरण है-
(a) हमारा हाथ और कुत्ते के अग्रपाद
(b) हमारे दाँत और हाथी के दाँत
(c) आलू एवं घास के उपरिभूस्तारी
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर: (a) हमारा हाथ और कुत्ते के अग्रपाद
व्याख्या: समजात अंग वे अंग होते हैं जिनकी आधारभूत संरचना समान होती है, क्योंकि वे एक共同的 पूर्वज से विरासत में मिले होते हैं, लेकिन उनके कार्य अलग-अलग हो सकते हैं। मानव का हाथ और कुत्ते का अग्रपाद (आगे का पैर) की हड्डियों की मूल संरचना एक जैसी है, पर कार्य भिन्न हैं (पकड़ना बनाम चलना)। यह समजातता का स्पष्ट उदाहरण है। विकल्प (b) और (c) समरूप अंगों (समान कार्य, भिन्न उत्पत्ति) के उदाहरण हैं।
3. विकासीय दृष्टिकोण से हमारी किससे अधिक समानता है-
(a) चीन के विद्यार्थी
(b) चिम्पैंजी
(c) मकड़ी
(d) बैक्टीरिया
उत्तर: (a) चीन के विद्यार्थी
व्याख्या: विकासीय दृष्टिकोण से, जीवों के बीच समानता उनके विकासवादी संबंध और आनुवंशिक निकटता पर निर्भर करती है। मनुष्य (हम) और चीन का विद्यार्थी दोनों ही होमो सेपियन्स प्रजाति के हैं, इसलिए उनके बीच आनुवंशिक और शारीरिक समानता लगभग 100% है। चिम्पैंजी हमारा निकटतम जीवित रिश्तेदार है, लेकिन फिर भी आनुवंशिक समानता लगभग 98-99% ही है। मकड़ी और बैक्टीरिया तो हमसे बहुत दूर के जीव हैं। इसलिए, सबसे अधिक समानता निश्चित रूप से एक अन्य मनुष्य (चीन के विद्यार्थी) से ही है।
4. एक अध्ययन में देखा गया कि हल्के रंग की पृष्ठभूमि पर हल्के रंग की कीट पतंगें जीवित रहती हैं जबकि गहरे रंग वाली आसानी से पहचान ली जाती हैं और शिकार बन जाती हैं। गहरे रंग की पृष्ठभूमि पर यह घटना उलट जाती है। प्रकृति द्वारा कीट पतंगों के चयन की इस प्रक्रिया को कहते हैं-
(a) यादृच्छिक चयन
(b) कृत्रिम चयन
(c) प्राकृतिक चयन
(d) कीट चयन
उत्तर: (c) प्राकृतिक चयन
व्याख्या: यहाँ पर्यावरण (पृष्ठभूमि का रंग) उन कीटों का चयन कर रहा है जिनका रंग छलावरण (camouflage) प्रदान करता है और उन्हें शिकारियों से बचाता है। जो कीट परिवेश के अनुकूल नहीं हैं, वे पकड़े जाते हैं और उनकी संख्या कम हो जाती है। पर्यावरण के दबाव के कारण समय के साथ लाभकारी लक्षण (यहाँ रंग) वाले जीवों की आबादी में वृद्धि होती है। प्रकृति द्वारा इस स्वचालित और अनियोजित चयन प्रक्रिया को ही प्राकृतिक चयन कहते हैं, जो डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत का मुख्य आधार है।
5. जीवाश्म क्या हैं? ये किस प्रकार बनते हैं? किन्हीं दो जीवाश्मों के नाम लिखें।
उत्तर:
जीवाश्म क्या हैं: जीवाश्म प्राचीन काल के पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों के अवशेष, निशान या छाप होते हैं, जो चट्टानों की परतों में संरक्षित पाए जाते हैं। ये लाखों-करोड़ों वर्ष पुराने हो सकते हैं और पृथ्वी के इतिहास तथा जीवन के विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान करते हैं।
जीवाश्म कैसे बनते हैं: जीवाश्म बनने की मुख्य प्रक्रिया निम्नलिखित है:
- किसी जीव की मृत्यु के बाद, उसका शरीर तेजी से रेत, मिट्टी या कीचड़ से ढक जाता है, जिससे सड़न-गलन रुक जाती है।
- लाखों वर्षों तक दबाव और रासायनिक परिवर्तनों के कारण, नरम ऊतक लगभग पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं, लेकिन कठोर भाग जैसे हड्डियाँ, दाँत, खोल या लकड़ी खनिजों (जैसे सिलिका, कैल्साइट) से भर जाते हैं और पत्थर में बदल जाते हैं। इस प्रक्रिया को खनिजीकरण (Petrification) कहते हैं।
- कभी-कभी पूरा जीव बर्फ या एम्बर (राल) में दब जाता है और बिना किसी बड़े बदलाव के संरक्षित रह जाता है।
- कुछ जीवाश्म पदचिह्न, अंडे के छिलके या मल के नमूने के रूप में भी मिलते हैं, जिन्हें अनुरेख जीवाश्म (Trace Fossils) कहा जाता है।
दो जीवाश्मों के नाम:
- आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx): पक्षियों और सरीसृपों के बीच की कड़ी, यह एक पंखों वाला डायनासोर था।
- ट्राइलोबाइट (Trilobite): समुद्र में रहने वाला एक प्राचीन जीव, जो आर्थ्रोपोडा संघ से संबंधित था।
6. समजात तथा समरूप अंग में क्या अन्तर है? प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दें।
उत्तर: समजात और समरूप अंगों में मुख्य अंतर उनकी उत्पत्ति और कार्य के आधार पर है। नीचे तुलनात्मक विवरण दिया गया है:
| आधार | समजात अंग (Homologous Organs) | समरूप अंग (Analogous Organs) |
|---|---|---|
| परिभाषा | वे अंग जिनकी मूल संरचना एवं उत्पत्ति समान होती है, लेकिन कार्य भिन्न-भिन्न होते हैं। | वे अंग जिनके कार्य समान होते हैं, लेकिन मूल संरचना एवं उत्पत्ति भिन्न होती है। |
| विकासवादी महत्व | ये सामान्य पूर्वज से विकास का संकेत देते हैं। (विविधता का सिद्धांत) | ये भिन्न पूर्वजों में समान पर्यावरणीय दबाव के कारण हुए विकास को दर्शाते हैं। (अभिसारी विकास) |
| उदाहरण 1
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