Bihar Board Class 10th Hindi (व्याकरण एवं रचना) निबंध लेखन) Solutions
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Here we have provided Solution for निबंध लेखन) of Hindi (व्याकरण एवं रचना) subject for Class 10th students of Bihar Board of Secondary Education. There are various chapters in this Hindi (व्याकरण एवं रचना) such as अपठित गद्यांश), पत्र लेखन), निबंध लेखन), संज्ञा), सर्वनाम), लिंग), वाक्य प्रयोग द्वारा लिंग निर्णय), क्रिया(भेद), विशेषण और क्रिया विशेषण), पद परिचय), वाक्य(भेद), मुहावरे और लोकोक्तियाँ) and अलंकार). Summary of the same is given below:
| Board Name | Bihar Board of Secondary Education |
| Class | Class 10th |
| Content Type | Solution |
| Solution for | Class 10th students |
| Subject | Hindi (व्याकरण एवं रचना) |
| Chapter Name | निबंध लेखन) |
| Total Number of Chapter in this Subject | 13 |
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Bihar Board Class 10th Hindi (व्याकरण एवं रचना) निबंध लेखन) Solutions
View the following solutions for Bihar Board Class 10th Hindi (व्याकरण एवं रचना) निबंध लेखन). These solutions are available for viewing online.
1. निम्नलिखित में से कौन-सा निबंध का प्रकार नहीं है?
(क) वर्णनात्मक निबंध
(ख) विवरणात्मक निबंध
(ग) विचारात्मक निबंध
(घ) कथात्मक निबंध
उत्तर: (ख) विवरणात्मक निबंध। निबंध के मुख्य प्रकार वर्णनात्मक, विवेचनात्मक (विचारात्मक), भावात्मक और कथात्मक होते हैं। 'विवरणात्मक' शब्द आमतौर पर निबंध के एक प्रकार के रूप में प्रयोग नहीं किया जाता है।
2. निबंध लेखन में किस बात का ध्यान रखना चाहिए?
(क) भाषा सरल और स्पष्ट हो
(ख) विषय से संबंधित तथ्यों का समावेश हो
(ग) निबंध की रूपरेखा तैयार कर ली जाए
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (घ) उपर्युक्त सभी। एक अच्छा निबंध लिखने के लिए इन सभी बातों का ध्यान रखना जरूरी है। सबसे पहले विषय को समझकर एक रूपरेखा (भूमिका, विस्तार, उपसंहार) बनानी चाहिए। भाषा सरल और प्रवाहमय होनी चाहिए तथा तथ्यों को सटीक और क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करना चाहिए।
3. 'विद्यार्थी जीवन' विषय पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर:
विद्यार्थी जीवन
भूमिका: विद्यार्थी जीवन मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और आधारभूत चरण है। यह वह समय है जब व्यक्ति का चरित्र निर्माण होता है, भविष्य की नींव पड़ती है और ज्ञान का भंडार भरा जाता है। इसे 'सीखने की अवस्था' कहा जाता है।
विस्तार: विद्यार्थी का प्रमुख कर्तव्य पढ़ाई में मन लगाना और अनुशासन में रहना है। इस काल में उसे केवल पाठ्यपुस्तकों का ही नहीं, बल्कि जीवन के व्यावहारिक पाठों का भी ज्ञान अर्जित करना चाहिए। खेलकूद, साहित्य, संगीत आदि सह-शैक्षणिक गतिविधियों से उसका सर्वांगीण विकास होता है। गुरुजनों का आदर और माता-पिता की आज्ञा का पालन करना विद्यार्थी के लिए आवश्यक है। इस अवस्था में सदाचार, समय की पाबंदी और परिश्रम की आदतें डाल लेनी चाहिए, क्योंकि ये आदतें जीवनभर काम आती हैं।
उपसंहार: विद्यार्थी जीवन भविष्य के निर्माण की प्रयोगशाला है। यहाँ अर्जित किया गया ज्ञान और अनुशासन ही भावी जीवन की सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसलिए प्रत्येक विद्यार्थी को इस स्वर्णिम अवसर का सदुपयोग करते हुए अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
4. 'प्रदूषण की समस्या' विषय पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर:
प्रदूषण की समस्या
भूमिका: आधुनिक युग की सबसे विकराल और चुनौतीपूर्ण समस्या प्रदूषण है। प्रदूषण का अर्थ है - वायु, जल, भूमि आदि प्राकृतिक तत्वों में हानिकारक पदार्थों की मिलावट, जिससे पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता है और जीव-जंतुओं तथा मनुष्यों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
विस्तार: प्रदूषण कई प्रकार का होता है। वायु प्रदूषण कारखानों और वाहनों से निकलने वाले धुएं के कारण होता है। जल प्रदूषण नालों और कारखानों के रसायनयुक्त पानी को नदियों में बहाने से फैलता है। ध्वनि प्रदूषण शोर-शराबे वाले वाहनों, लाउडस्पीकरों और मशीनों के कारण होता है। भूमि प्रदूषण प्लास्टिक और अविघटित कचरे के जमाव के कारण होता है। प्रदूषण के कारण सांस की बीमारियाँ, कैंसर, पेयजल की कमी और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।
उपसंहार: प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। अधिक से अधिक पेड़ लगाना, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना, प्लास्टिक के उपयोग को कम करना, कचरे का सही निपटान और लोगों में जागरूकता फैलाना इसके प्रमुख उपाय हैं। सरकार और नागरिकों को मिलकर काम करना होगा ताकि हमारी पृथ्वी स्वच्छ और रहने योग्य बनी रहे।
ध्यान दें: निबंध लिखते समय विषय के अनुरूप उदाहरण, कविता की पंक्तियाँ या महापुरुषों के विचार जोड़कर इसे और प्रभावी बनाया जा सकता है। भाषा सरल, स्पष्ट और प्रवाहमय होनी चाहिए।
1. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 200 शब्दों में निबंध लिखिए-
(क) मेरा प्रिय खेल
उत्तर:
खेल मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये हमें स्वस्थ रखने के साथ-साथ अनुशासन, सहयोग और धैर्य जैसे गुण सिखाते हैं। मेरा प्रिय खेल क्रिकेट है। यह केवल एक खेल नहीं, बल्कि भारत में एक जुनून और उत्सव की तरह है।
क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो शारीरिक फिटनेस के साथ-साथ मानसिक सजगता भी विकसित करता है। इस खेल में दो टीमें होती हैं, जिनमें ग्यारह-ग्यारह खिलाड़ी होते हैं। यह खेल बल्ले, गेंद और विकेटों से खेला जाता है। मैदान में खिलाड़ियों के बीच तालमेल, कप्तान की रणनीति और प्रत्येक खिलाड़ी का अपना योगदान टीम की सफलता का आधार होता है।
मुझे क्रिकेट इसलिए भी पसंद है क्योंकि यह सिखाता है कि जीत और हार जीवन के दो पहलू हैं। कभी हम शतक लगाते हैं, तो कभी शून्य पर आउट हो जाते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि हम हार न मानें और निरंतर प्रयास करते रहें। मेरे आदर्श खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर हैं, जिन्होंने अपनी लगन और मेहनत से इस खेल में अनेक कीर्तिमान स्थापित किए। क्रिकेट ने मुझे टीम भावना, समय का पाबंदी और लक्ष्य के प्रति समर्पण का पाठ पढ़ाया है।
(ख) समाचार-पत्र
उत्तर:
समाचार-पत्र आधुनिक जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। इसे जनसंचार का एक शक्तिशाली माध्यम माना जाता है। प्रतिदिन सुबह घर-घर पहुँचने वाला अखबार दुनिया भर की घटनाओं, विचारों और जानकारियों से हमें अवगत कराता है।
समाचार-पत्र के कई लाभ हैं। सबसे पहले, यह हमें देश-विदेश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के बारे में जागरूक बनाता है। दूसरे, यह जनमत निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। तीसरे, विज्ञापनों के माध्यम से यह उत्पादक और उपभोक्ता के बीच एक कड़ी का काम करता है, जिससे व्यापार को बढ़ावा मिलता है।
हालाँकि, समाचार-पत्रों की एक सीमा भी है। कभी-कभी संवाददाता पक्षपातपूर्ण या अतिरंजित खबरें प्रकाशित कर देते हैं, जिससे समाज में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए पाठकों में समझदारी होनी चाहिए कि वे किसी एक अखबार पर निर्भर न रहकर विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त करें। निष्कर्षतः, समाचार-पत्र लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और एक जागरूक नागरिक बनने के लिए इसका नियमित अध्ययन आवश्यक है।
(ग) विज्ञान के चमत्कार
उत्तर:
आधुनिक युग विज्ञान का युग है। विज्ञान ने मानव जीवन को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। इसने असंभव को संभव बना दिया है और इसीलिए हम इसे 'विज्ञान के चमत्कार' कहते हैं।
विज्ञान ने संचार के क्षेत्र में अद्भुत क्रांति ला दी है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से हम पल भर में दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से बात कर सकते हैं या संदेश भेज सकते हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, एमआरआई और जटिल शल्य चिकित्सा ने मनुष्य की औसत आयु बढ़ा दी है। परिवहन के क्षेत्र में हवाई जहाज, बुलेट ट्रेन और स्वचालित वाहनों ने लंबी दूरियाँ सिमट कर रह गई हैं।
कृषि में नई तकनीकों और उन्नत बीजों के प्रयोग से खाद्यान्न उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। घरेलू जीवन में बिजली के उपकरणों जैसे रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन, एसी ने काम को आसान और जीवन को सुखमय बना दिया है। हालाँकि, विज्ञान के दुरुपयोग से हथियारों और प्रदूषण जैसी समस्याएँ भी पैदा हुई हैं। इसलिए हमें विज्ञान का उपयोग मानवता की भलाई और प्रगति के लिए ही करना चाहिए।
(घ) स्वच्छ भारत अभियान
उत्तर:
स्वच्छ भारत अभियान भारत सरकार द्वारा चलाया गया एक महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय मिशन है। इसकी शुरुआत 2 अक्टूबर 2014 को महात्मा गांधी की 145वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने की थी। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य देश को खुले में शौच से मुक्त कराना और ठोस एवं तरल कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन करना है।
यह अभियान केवल सरकारी प्रयास नहीं, बल्कि एक जन आंदोलन है। इसमें स्कूल-कॉलेज के छात्र, सामाजिक संगठन, निजी कंपनियाँ और आम नागरिक सभी शामिल हैं। स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम, रैलियाँ और शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किए जाते हैं। गाँव-गाँव और शहर-शहर में शौचालयों का निर्माण किया गया है।
स्वच्छ भारत अभियान के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। इससे न केवल पर्यावरण साफ-सुथरा हुआ है, बल्कि बीमारियों में भी कमी आई है। स्वच्छता से लोगों के जीवन स्तर में सुधार हुआ है और महिलाओं को गरिमामय जीवन मिला है। हालाँकि, अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इस मिशन की सफलता तभी संभव है जब प्रत्येक नागरिक इसे अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझे और स्वच्छता को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाए।
व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के लिए अनशासन आवश्यक अनुशासन न केवल व्यक्तिगत जीवन के लिए आवश्यक है, अपितु सामाजिक जीवन के लिए भी परम आवश्यक है। व्यक्तिगत जीवन में अनुशासन का अर्थ है. छात्र को हर कार्य समय और व्यवस्था से
अनुशासन का अर्थ है, समय और व्यवस्था के साथ कार्य करना। व्यक्तिगत जीवन में इसका मतलब है कि एक छात्र को अपने दैनिक कार्यों को एक निश्चित समय-सारणी के अनुसार करने की आदत डालनी चाहिए। उसे समय पर उठना, अध्ययन करना, खेलना और विश्राम करना चाहिए। यह व्यवस्था उसे जीवन में सफलता की ओर ले जाती है।
सामाजिक जीवन में अनुशासन होना अनिवार्य है। जैसे - गाड़ियाँ, बसें, विद्यालय कार्यालय सभी समय से खुलें, समय से बंद हों। कर्मचारी ठीक समय पर अपने-अपने स्थान पर कार्य के लिए तैयार हों। वहाँ ठालमटोल न हो। इसी के साथ छात्र भी सामाजिक कार्यों में यथासमय पहुंचे। वे वहाँ की सारी नियम-व्यवस्था का पालन करें।
सामाजिक जीवन सुचारू रूप से चलाने के लिए अनुशासन बहुत जरूरी है। जब बसें, ट्रेनें, स्कूल और दफ्तर समय पर खुलते और बंद होते हैं, तो पूरे समाज का काम आसानी से चलता है। अगर हर व्यक्ति समय का पाबंद हो और नियमों का पालन करे, तो समाज में शांति और व्यवस्था बनी रहती है। छात्रों को भी सामाजिक कार्यक्रमों में समय पर पहुँचकर अनुशासन का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
अनशासन एक महत्त्वपूर्ण जीवन-मूल्य- पास
अनुशासन केवल एक नियम नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण जीवन-मूल्य है। यह एक ऐसी आदत है जो व्यक्ति के चरित्र को निखारती है। एक अनुशासित व्यक्ति साफ-सुथरा रहता है, विनम्र बोलता है और दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करता है। वह समाज में सम्मान पाता है और अपने आसपास के वातावरण को भी सुव्यवस्थित बनाता है। इस प्रकार, अनुशासन सफल और सार्थक जीवन की नींव है।
यदि मैं अपने विद्यालयका प्रधानाचार्य होता
अगर मैं अपने विद्यालय का प्रधानाचार्य होता, तो सबसे पहले मैं विद्यालय की दिनचर्या को पूरी तरह नियमित करता। यह सुनिश्चित करता कि स्कूल समय पर खुले, प्रार्थना और सभी कालांश (पीरियड) निश्चित समय पर हों। मेरा मुख्य लक्ष्य अनुशासन और व्यवस्था को बनाए रखना होता।
परीक्षाओं की योजना - मेरी दृष्टि में परीक्षाओं की योजना पढ़ाई के लिए अत्यंत हितकर है। अत: मैं प्रयास करूंगा कि छात्रों की समय- समय पर छोटी-छोटी परीक्षाएं हों। वर्ष में दो बार बड़ी परीक्षाएँ हों ताकि छात्र छोटी परीक्षाओं के माध्यम से विषय को सारपूर्वक समझ लें और बड़ी परीक्षाओं के द्वारा पूरा पाठ्यक्रम तैयार कर लें। मैं नकल और धोखाधड़ी को पूर्णतया समाप्त कर दूंगा, चाहे इसके लिए किसी का दबाव क्यों न सहना पढ़े।
मैं परीक्षाओं की एक व्यवस्थित योजना बनाता। वर्ष भर में समय-समय पर छोटी यूनिट टेस्ट लेता ताकि छात्र लगातार पढ़ते रहें। साथ ही, वर्ष में दो मुख्य परीक्षाएँ (अर्धवार्षिक और वार्षिक) आयोजित करता। मैं नकल पर पूरी तरह रोक लगाता और किसी भी दबाव में आए बिना निष्पक्ष परीक्षा का वातावरण बनाता।
गरीब तथा योग्य छानों की व्यवस्था में विद्यालय में उन गुदड़ी के तालों को पहचानने और विकसित करने का पूरा प्रयास करूंगा जो गरीबी के कारण अपनी प्रतिभा का विकास नहीं कर पाते। ऐसे छात्रों को प्रोत्साहन और सहायता दिलवाने का प्रयास करूंगा।
मैं गरीब परंतु मेधावी छात्रों पर विशेष ध्यान देता। ऐसे "गुदड़ी के लाल" छात्रों की प्रतिभा को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ने के अवसर देता। शुल्क में छूट, पुस्तकों की सहायता और विशेष कोचिंग की व्यवस्था करके उनकी प्रतिभा के विकास में मदद करता।
खेलने २
(नोट: यह शीर्षक अपूर्ण प्रतीत होता है। संभवतः यह 'खेल-कूद का महत्व' या इसी प्रकार का होना चाहिए।)
खेल-कट को प्रोत्साहन खेल-कूद को बढ़ावा देने के लिए मैं ऐसी व्यवस्था करूंगा कि प्रत्येक रूचिवाने छात्र को अपना प्रिय खेल खेलने का अवसर मिल सके। इसके लिए मैं कभी-कभी विद्यालय के छात्रों की विभिन्न खेल-प्रतियोगिताएं आयोजित करूँगा।
मैं खेल-कूद को विद्यालय जीवन का एक अभिन्न अंग बनाता। विभिन्न खेलों के लिए अच्छे मैदान और उपकरणों की व्यवस्था करता। हर छात्र को अपनी रुचि के खेल में भाग लेने का मौका देता। वार्षिक खेल-दिवस, हाउस प्रतियोगिताएँ और अंतर-विद्यालय प्रतियोगिताओं में भागीदारी को प्रोत्साहित करता, ताकि छात्रों का शारीरिक और मानसिक विकास हो सके।
सांस्कृतिक कार्यकर मुझे भाषण, वाद-विवाद, कविता-पाठ, नाटक, अभिनय आदि सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गहरी रुचि है। मैं चाहूँगा कि मेरे विद्यालय के छात्र इन कार्यक्रमों में अधिकाधिक भाग लें। इसके लिए मैं कलासंपन्न अध्यापकों का एक उत्साही मंडल तैयार करूँगा जो बच्चों में ये कलाएं विकसित करें तथा उनका चहुंमुखी विकास करें।
मैं सांस्कृतिक गतिविधियों को बहुत महत्व देता। भाषण, वाद-विवाद, नाटक, संगीत और नृत्य जैसी प्रतियोगिताएँ आयोजित करता। इन गतिविधियों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था करने हेतु कला-प्रेमी शिक्षकों की एक समिति बनाता। इससे छात्रों का आत्मविश्वास बढ़ता और उनकी रचनात्मक प्रतिभा निखरती।
अध्यापक-छात्र संबंध - मेरा प्रयास होगा कि मेरे विद्यालय के छात्र केवल ग्राहक न हों और अध्यापक ज्ञान-विक्रेता न हों। उनमें ज्ञान, श्रद्धा और प्रेम का गहरा संबंध होना चाहिए। इसके लिए मैं अनेक युक्तियों से प्रयास करूंगा। मैं अपने अध्यापकों और छात्रों के मध्य निर्भवता का वातावरण बनाऊँगा ताकि सब अपनी भावनाएँ एक-दूसरे को कह-सुन सकें। मैं समझता हूँ कि इन उपायों से मेरा विद्यालय एक श्रेष्ठ विद्यालय बन पाएगा।
मेरा लक्ष्य शिक्षक और छात्र के बीच एक स्वस्थ, आदरपूर्ण और खुला संबंध स्थापित करना होता। मैं ऐसा वातावरण बनाता जहाँ छात्र बिना डर के शिक्षकों से अपनी समस्याएँ साझा कर सकें। नियमित बैठकों और अनौपचारिक गतिविधियों के माध्यम से यह संबंध मजबूत बनता। मेरा विश्वास है कि ज्ञान का आदान-प्रदान तभी सफल होता है जब इसमें श्रद्धा और प्रेम का समावेश हो।
छात्र और शिक्षक
छात्र और शिक्षक का संबंध विश्व के सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण संबंधों में से एक है। यह संबंध ज्ञान, मार्गदर्शन और आदर्शों के आदान-प्रदान पर आधारित है।
घर-प्रारंभिक पाठशाला, माता-पिता प्रथम शिक्षक - यदि हर सीखने वाले को छात्र मानें . तो बच्चा पैदा होते ही छात्र हो जाता है। वह अपने माता-पिता और घर के वातावरण से संस्कार ग्रहण करता है। अतः उसके माता-पिता प्रथम शिक्षक हुए और घर प्रारंभिक पाठशाला हुई।
बच्चा जन्म लेते ही सीखना शुरू कर देता है। इस दृष्टि से उसके पहले शिक्षक उसके माता-पिता होते हैं। वे उसे बोलना, चलना और अच्छे-बुरे का भेद सिखाते हैं। घर का वातावरण ही उसकी पहली पाठशाला होती है, जहाँ से वह जीवन के मूलभूत संस्कार और मूल्य सीखता है।
विद्यालय में शिक्षक ही माता-पिता- कोई बच्चा जब घर की दहलीज पार करके सीखने जाता है तो वह विद्यालय में प्रवेश लेता है। वहाँ उसके शिक्षक उसे शिक्षा प्रदान करते हैं। प्राथमिक कक्षाओं के शिक्षक माता-पिता के समान बहुत ख्नरेही और सावधान होते हैं। वे बच्चे को ख्रेह देते हुए शिक्षा देते हैं। वे शिक्षक और माता-पिता दोनों की भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि बच्चे शिक्षक को माता-पिता से भी अधिक मान देते हैं।
जब बच्चा विद्यालय जाता है, तो शिक्षक उसके लिए माता-पिता की भूमिका निभाते हैं, खासकर प्राथमिक स्तर पर। वे स्नेह और धैर्य के साथ उसे न केवल पढ़ाते हैं, बल्कि उसकी देखभाल भी करते हैं। इसी कारण बच्चे अक्सर अपने शिक्षकों को बहुत सम्मान और प्यार देते हैं।
शिक्षक का दायित्व : पढ़ाना, दिशा-निर्देशन, सत्कारयों की प्रेरणा- शिक्षक का काम केवल पुस्तकें पढ़ाना नहीं होता। वह बच्चों को अक्षर-ज्ञाव देता है। अक्षरों में छिपे अर्थ समझाता है। उनसे भी बढ़कर उन्हें जीवन जीने की सही दिशा समझाता है तथा शुभ कर्मों की ओर आगे बढ़ाता है। वह मार्गदर्शक और प्रेरक का काम भी करता है।
एक शिक्षक का दायित्व बहुत व्यापक है। उसका काम सिर्फ किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि छात्रों का सर्वांगीण विकास करना है। वह उन्हें नैतिक मूल्य सिखाता है, जीवन के लक्ष्य निर्धारित करने में मदद करता है और अच्छे कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। एक सच्चा शिक्षक जीवन भर के लिए मार्गदर्शक बन जाता है।
छात्र का दायित्व-- छात्र का दायित्व बनता है कि वह शिक्षक के प्रति सम्मान प्रकट करे। उन्हें श्रद्धा दे। कहा भी गया है-श्रद्धावान् लभते ज्ञानम। श्रद्धावान को ही ज्ञान प्राप्त होता है। अतः छात्रों को चाहिए कि वे अध्यापकों के प्रति श्रद्धा प्रकट करें तथा उनकी एक-एक बात को जीवन में उतारें।
छात्र का सबसे बड़ा दायित्व अपने गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव रखना है। जो छात्र शिक्षक की बात को गंभीरता से सुनता और मानता है, वही सच्चा ज्ञान प्राप्त कर पाता है। छात्र को चाहिए कि वह शिक्षक द्वारा दिए गए ज्ञान और सीख को अपने जीवन में अमल में लाए।
परस्पर संबंध- छात्र और शिक्षक का संबंध ग्राहक और दुकानदार जैसा वहीं है। उनमें श्रद्धा और दान का संबंध है। छात्र को चाहिए कि वह अध्यापकों को सम्मान दे। अध्यापकों को चाहिए कि वे छात्रों Hl YT Hl ave We I
(नोट: वाक्य अपूर्ण और कुछ अक्षर असंबद्ध हैं। संभवतः अर्थ है - अध्यापकों को चाहिए कि वे छात्रों को पूर्ण मार्गदर्शन दें।)
छात्र और शिक्षक का संबंध ग्राहक-दुकानदार जैसा नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक और शैक्षिक संबंध है। यह श्रद्धा और ज्ञान-दान पर आधारित है। छात्र को शिक्षक का आदर करना चाहिए और शिक्षक को चाहिए कि वह छात्र के कल्याण के लिए निस्वार्थ भाव से ज्ञान बाँटे।
दोनों परस्पर अपने-अपने दायित्वों को समझें- कबीर ने छात्र-अध्यापक संबंध के बारे में कहा है
"गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि का? खोद।
अंतर हाथ पसारिए, बाहर-बाहर चोट॥"
कबीरदास जी के इस दोहे का अर्थ है कि गुरु कुम्हार के समान है और शिष्य कच्ची मिट्टी के घड़े के समान। गुरु शिष्य को अच्छे संस्कार देकर उसे सुव्यवस्थित रूप देता है। बाहर से डांट-फटकार (चोट) लगाकर वह उसके भीतर के दोषों को दूर करता है, ताकि शिष्य मजबूत और उपयोगी बन सके।
यदि गुरु को कभी शिष्य को डाँटना भी पड़े तो अवश्य डाँटे, किंतु उसके संस्कार के लिए सुधार के लिए। ऐसा सद्गुर॒ सौभाग्य से प्राप्त होता है।
एक सच्चा गुरु (सद्गुरु) शिष्य के भले के लिए ही कठोर होता है। यदि उसे शिष्य को डाँटना या सुधारना पड़े, तो वह ऐसा प्रेम और उसके भविष्य को सुधारने के उद्देश्य से करता है, न कि द्वेष में। ऐसा गुरु जीवन में एक सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
दूरदर्शन का विद्यार्थियों पर प्रभाव
दूरदर्शन (टेलीविजन) आज के युग का एक शक्तिशाली माध्यम है, जिसका विद्यार्थियों के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इस प्रभाव के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू हैं।
दूरदर्शन के प्रति विद्यार्थियों में बढ़ता आकर्षण- एक समय था, जब विद्यार्थी विद्यालय से घर पहुंचते ही माता-पिता से नमस्कार करके भोजन माँगते थे। अब स्थिति यह है कि वे आते ही टी.वी. खोल लेते हैं। वे रास्ते में ही आने वाले कार्यक्रम का रस लेने लगते हैं। दूरदर्शन विद्यार्थियों की जान बनता जा रहा है।
आज विद्यार्थियों का टेलीविजन के प्रति आकर्षण बहुत बढ़ गया है। पहले बच्चे घर आकर माता-पिता से मिलते थे, अब वे सीधे टीवी के सामने बैठ जाते हैं। वे अपने पसंदीदा कार्यक्रमों के समय का इंतजार करते रहते हैं। टीवी उनकी दिनचर्या और मनोरंजन का केंद्र बन गया है, जो कई बार अध्ययन के समय को भी प्रभावित करता है।
शैक्षिक और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम - दरदर्शन पर अनेक प्रकार के शैक्षिक तथा ज्ञानवर्धक कार्यक्रम भी पमारित किए जा रहे हैं। डिस्कवरी और नेशनल ज्योग्राफिक चैनल शुद्ध रूप से .. ज्ञानवर्धक हैं। इसके अतिरिक्त अनेक समाचार-चल भी जान में वृद्धि करते
(नोट: वाक्य अपूर्ण है। संभवतः अंत है - 'समाचार चैनल भी ज्ञान में वृद्धि करते हैं।')
दूरदर्शन के सकारात्मक पक्ष में शैक्षिक कार्यक्रम आते हैं। चैनल जैसे डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफिक, और दूरदर्शन के शैक्षिक चैनल विज्ञान, इतिहास, भूगोल और सामान्य ज्ञान के बारे में रोचक जानकारी देते हैं। समाचार चैनल देश-दुनिया की खबरों से अवगत कराते हैं। अगर विद्यार्थी इन कार्यक्रमों को चुनकर देखें, तो उनका ज्ञान निश्चित रूप से बढ़ता है।
हैं। अनेक चैनलों द्वारा प्रश्नोत्तरी, चर्चा, वाद-विवाद, बहस आदि दिखाई जाती हैं। इन्हें दखकर जात्रा का बहुत ज्ञानतंर्शन होता है।
उत्तर: टेलीविज़न एक शक्तिशाली शैक्षिक उपकरण है। शैक्षिक चैनलों पर प्रश्नोत्तरी, वैज्ञानिक चर्चाएँ, ऐतिहासिक वाद-विवाद और सामाजिक बहस जैसे कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। इन कार्यक्रमों को देखने से छात्रों का ज्ञान बढ़ता है और उनके मानसिक क्षितिज का विस्तार होता है। यह जानकारी पुस्तकों से अलग, दृश्य-श्रव्य माध्यम से मिलती है, जिससे विषय को समझना आसान और रोचक हो जाता है।
समय और स्वास्थ्य की हानि - दुर्भाग्य से छात्र दूरदर्शन में केवल मनारंजन की सामग्री ढूँढ़ते हैं। वे चलचित्र, टी.वी. सीरियल, संगीत, खेलकूद या अन्य मनोरंजक प्रतियोगिताओं में रुचि लेते हैं। इससे उनको दोहरी हानि होती है। वे खेल-कूद का समय काटकर टी.वी. पर खेलकूद देखते हैं। इससे उनका मन तो तरंगित होता है किंतु शरीर निष्क्रिय रहता है। परिणामस्वरूप बच्चे अस्वस्थ रह जाते हैं। आज के बच्चे पहले की तुलना में कमजोर, अस्वस्थ और आलसी हैं। उनका बहुत-सा समय टी.वी. देखने में ही व्यय हो जाता है।
उत्तर: अत्यधिक टेलीविज़न देखने से छात्रों के समय और स्वास्थ्य दोनों की हानि होती है। वे मनोरंजन के कार्यक्रमों में इतना खो जाते हैं कि शारीरिक गतिविधियाँ और बाहरी खेल छूट जाते हैं। टीवी पर खेल देखना और स्वयं खेलना दो अलग बातें हैं। एक में शरीर सक्रिय रहता है, दूसरे में निष्क्रिय। इस निष्क्रिय जीवनशैली के कारण मोटापा, आँखों की कमजोरी और शारीरिक दुर्बलता जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। समय का दुरुपयोग होने से पढ़ाई और अन्य रचनात्मक कार्य भी प्रभावित होते हैं।
अध्ययन में सबसे बड़ी बाधा- टी.वी. छात्रों के अध्ययन में सबसे बड़ी बाधा है। इस पर ऐसे-ऐसे आकर्षक, सनसनीखेज और मनोरंजक कार्यक्रम दिखाए जाते हैं कि छात्र चाहकर भी उन्हें छोड़ नहीं पाते। परिणामस्वरूप उनका ध्यान पढ़ाई में नहीं लगता। विद्यालय में भी वे टी. वी. सीरियलों की चर्चा में रुचि लेते हैं। यदि वे एक बार टी.वी खोल लें तो फिर बंद करने का नाम ही नहीं लेते।
उत्तर: निस्संदेह, अनियंत्रित टेलीविज़न देखना छात्रों की पढ़ाई में सबसे बड़ी रुकावट बन सकता है। टीवी के लुभावने कार्यक्रम उनका ध्यान भटकाते हैं, जिससे अध्ययन के लिए आवश्यक एकाग्रता टूट जाती है। होमवर्क और रिवीजन का समय टीवी सीरियल देखने में निकल जाता है। स्कूल में भी बच्चों की बातचीत का विषय अक्सर टीवी कार्यक्रम ही होते हैं, जो उनकी शैक्षिक चर्चाओं को कम कर देता है। आत्म-अनुशासन की कमी के कारण वे टीवी देखने की लत में फंस जाते हैं।
संतुलन की आवश्यकता छात्र मानव है। उसके पास मन है। मन को रंजन चाहिए, मनोरंजन चाहिए। परंतु उसकी भी सीमा होनी चाहिए। टी.वी. अपने लुभावने कार्यक्रमों से उस सीमा को तोड़ता है। छात्रों को चाहिए कि वे उसके लालच से बचें। पढ़ाई की कीमत पर टी. वी. न देखें। तब टी.वी. उनके लिए सौभाग्य का दूत कहलाएगा।
उत्तर: टेलीविज़न के उपयोग में संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। मनोरंजन मानव जीवन का एक अंग है, पर उसकी एक उचित सीमा होनी चाहिए। छात्रों को एक निश्चित समय-सारणी बनाकर टीवी देखना चाहिए, ताकि उनकी पढ़ाई और स्वास्थ्य प्रभावित न हों। शैक्षिक और ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों को प्राथमिकता देनी चाहिए। जब टीवी का उपयोग एक सीमित और नियंत्रित उपकरण के रूप में किया जाएगा, तभी वह छात्र के लिए वरदान साबित होगा।
भारतीय संस्कृति : अनेकता में एकता
उत्तर: भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता 'अनेकता में एकता' है। यहाँ विभिन्न धर्म, भाषा, पहनावा, खान-पान और रीति-रिवाज पाए जाते हैं, फिर भी सभी लोगों में भारतीय होने का भाव एक समान है। यह एकता हमें त्योहारों, राष्ट्रीय पर्वों और सामूहिक उत्साह में देखने को मिलती है। भारत की यह सांस्कृतिक समृद्धि और सहिष्णुता ही इसे विश्व में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।
भारतीयता का विकास-भारतवर्ष एक विशाल सागर है, जिसमें अनेक नदियाँ गिरती हैं। जिस प्रकार नदियाँ अपना पृथक् अस्तित्व खोकर समुद्र में लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार भारत के विभिन्न समुदाय अपनी-अपनी विशेषताओं को लिए हुए भी भारतीय कहलाते हैं। कोई हिंदू भारतीय है, कोई मुसलिम भारतीय है, कोई बौद्ध, सिख या ईसाई भारतीय है। ये सभी भिन्न-भिन्न धर्मों को मानते हुए भी भारतीय जीवन के साथ एकाकार हो गए हैं। भारत की यही विशेषता इस देश को औरों से अलग करती है।
उत्तर: भारतीयता का विकास एक समावेशी प्रक्रिया रही है। यहाँ आकर विभिन्न जातियों, संप्रदायों और संस्कृतियों ने अपनी अलग पहचान को बनाए रखते हुए भी एक बड़े राष्ट्रीय परिवार का हिस्सा बन लिया। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन सभी अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए भी 'भारतीय' हैं। यह सहअस्तित्व और सामंजस्य ही भारत की असली ताकत और पहचान है।
समरसता-भारत की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है--यहाँ के जीवन की समरसता। यहाँ हर प्रदेश में मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारे या गिरजाघर मिल जाएंगे। यहाँ के लोग सब धर्मों के प्रति श्रद्धा रखते हैं। सभी धर्मों के त्योहार भी पूरे उत्साह से मनाए जाते हैं। ईद, क्रिसमिस, होली-दीपावली पर पूरा देश खुशियाँ मनाता है। 15 अगस्त तथा 26 जनवरी यहाँ के राष्ट्रीय त्योहार हैं। हर वर्ग का भारतीय इनमें उत्साहपूर्वक सम्मिलित होता है।
उत्तर: भारत में जीवन की समरसता एक अनूठा दृश्य प्रस्तुत करती है। विभिन्न धर्मों के पूजा स्थल एक ही क्षेत्र में साथ-साथ देखे जा सकते हैं, जो यहाँ की धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाता है। लोग न केवल अपने बल्कि दूसरे धर्मों के त्योहारों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। राष्ट्रीय पर्व तो सभी भारतीयों को एक सूत्र में बाँध देते हैं। यह सामूहिक उत्सव मनाने की भावना ही भारत की सामाजिक एकजुटता का आधार है।
समान भाषा-भारतीय संस्कृति की एकता उसकी भाषा में भी व्यक्त होती है। यहाँ के हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, erat, set जैनों की अलग-अलग भाषाएँ नहीं हैं। एक प्रांत के सभी निवासी एक-सी भाषा का व्यवहार करते हैं। पंजाब का मुसलमान यदि पंजाबी बोलता है तो तमिल का मुसलमान तमिल बोलता है। इससे पता चलता है कि चाहे यहाँ लोगों के धर्म भिन्न .. हों, परंतु उनकी संस्कृति समान है। भारत में 19 मान्य राष्ट्रीय भाषाएँ हैं, सैकड़ों बोलियाँ हैं। फिर भी सारा देश हिंदी को राष्ट्रभाषा मानकर आपस में संपर्क स्थापित करता है।
उत्तर: भारत में भाषाई एकता का स्वरूप विशेष है। यहाँ धर्म भाषा नहीं निर्धारित करता। एक ही क्षेत्र के सभी निवासी, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, स्थानीय भाषा ही बोलते हैं। यह सांस्कृतिक एकता का प्रमाण है। देश में 22 आधिकारिक भाषाएँ और सैकड़ों बोलियाँ हैं, परंतु संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का महत्व सर्वमान्य है। यह भाषाई विविधता में एकता भारत को एक सूत्र में बाँधती है।
वेश-भूषा-भारत के सभी प्रांतों की अलग-अलग वेशभूषा है। यह वेशभूषा स्थानीय मौसम तथा आवश्यकतानुसार विकसित हुई है। उदाहरणतया, पूरे उत्तर प्रदेश में किसान. धोती-कुर्ता पहनते हैं और सिर पर पगड़ी घारण करते हैं। नगर के शिक्षित युवक पैंट-कमीज पहनते हैं। महिलाएं साड़ी या सूठ पहनती हैं।
उत्तर: भारत के विभिन्न प्रांतों की वेशभूषा उनकी भौगोलिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक परंपराओं को दर्शाती है। उत्तर भारत में पगड़ी के साथ धोती-कुर्ता, दक्षिण में लुंगी और अंगवस्त्र, राजस्थान में घाघरा-चोली और पूर्वोत्तर में विशेष प्रकार के वस्त्र प्रचलित हैं। शहरी क्षेत्रों में पश्चिमी पोशाक जैसे पैंट-शर्ट भी आम हैं। यह विविधता हमारी सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है, जबकि राष्ट्रीय पर्वों पर सभी भारतीय परंपरागत पोशाक पहनकर एकता प्रदर्शित करते हैं।
बृत्य-संगीत. भारत में बृत्य की एक नहीं, अनेक शैलियाँ हैं। भरतनाव्य, ओडिसी, कुचिपुडि, कथकली, मणिपुरी, कत्थक आदि परंपरागत बृत्य शैलियाँ हैं तो भंगड़ा, गिद्दा, नगा, बिहू आदि लोकप्रचलित बृत्य हैं। आज इन विविध बृत्य-शैलियों पर पूरे देश के लोग थिरकते हैं।
उत्तर: भारत नृत्य और संगीत की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध देश है। शास्त्रीय नृत्य की प्रमुख शैलियाँ जैसे भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी, कथकली, मणिपुरी और कुचिपुड़ी हैं। इनके अलावा, हर क्षेत्र के अपने लोक नृत्य हैं, जैसे पंजाब का भांगड़ा, राजस्थान का घूमर, गुजरात का गरबा, असम का बिहू और महाराष्ट्र का लावणी। ये सभी नृत्य शैलियाँ पूरे देश में लोकप्रिय हैं और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करती हैं।
भोजन-भारत में पकवानों की विधिता भी बहुत अधिक है। राजस्थान में दाल-बाटी, कोलकाता में चावल-मछली, पंजाब में रोटी-साग, दक्षिण में इडली-डोसा। इतनी विविधता के बीच एकता का प्रमाण यह है कि आज दक्षिण भारत के लोग दाल-रोटी उसी शौक से खाते हैं, जितने शौक से उत्तर भारतीय लोग इडली-डोसा खाते हैं। सचमुच भारत एक रंगबिरंगा गुलदस्ता है।
उत्तर: भारतीय खानपान में अद्भुत विविधता है, जो क्षेत्रीय जलवायु और उपलब्ध संसाधनों पर आधारित है। पंजाब का मक्के की रोटी और सरसों का साग, राजस्थान की दाल-बाटी-चूरमा, बंगाल की मछली-भात, दक्षिण भारत के इडली-डोसा-सांभर और गुजरात के ढोकला प्रसिद्ध हैं। आज पूरे देश में सभी क्षेत्रीय व्यंजन लोकप्रिय हैं। यह पाक-विविधता में एकता भारत को एक रंगबिरंगे गुलदस्ते के समान बनाती है।
मेरा प्यारा भारत देश
उत्तर: भारत मेरा प्यारा देश है। यह केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि भावनाओं, परंपराओं और गौरव का प्रतीक है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता, समृद्ध इतिहास, विविध संस्कृति और महान लोग इसे मेरे लिए अतुल्य बनाते हैं। मुझे इसकी अनेकता में एकता पर गर्व है। मैं इसकी प्रगति और समृद्धि के लिए सदैव तत्पर रहूँगा/रहूँगी।
प्राकृतिक सुंदरता - मेरा देश भारत संसार के देशों का सिरमौर है। यह प्रकृति की पुण्य - लीलास्थली है। माँ भारती के सिर पर हिमालय मुकुट के समान शोभायमान है। गंगा तथा यमुना . . इसके गले के हार हैं। दक्षिण में हिंदमहासागर भारत माता के चरणों को
उत्तर: भारत की प्राकृतिक सुंदरता अद्वितीय है। उत्तर में हिमालय पर्वत का विशाल शृंखला मुकुट के समान शोभा देती है। पवित्र नदियाँ गंगा, यमुना, गोदावरी और कावेरी इस धरती के गले के हार हैं। दक्षिण में हिंद महासागर इसके चरण धोता है। हरे-भरे मैदान, रेगिस्तान, घने जंगल और लंबी तटरेखा यहाँ के प्राकृतिक वैभव को बढ़ाते हैं। छह ऋतुओं का चक्र यहाँ के जीवन में विशेष रंग भरता है।
निरंतर UlaT रहता है। संसार में केवल यही एक देश है जहाँ षड़कतुओं का आगमन होता है। गंगा, यमुना, सतलुज, व्यास, गोमती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी अनेक नदियाँ हैं जो अपने अमृत-जल से इस देश की घरती की प्यास शांत करती हैं।
उत्तर: भारत एकमात्र ऐसा देश है जहाँ सभी छह ऋतुओं - ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर और वसंत का आगमन होता है। ये ऋतुएँ जीवन चक्र को संतुलित रखती हैं। देश की अनेक नदियाँ जैसे गंगा, यमुना, सतलुज, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी इसकी भूमि को उपजाऊ बनाती हैं, कृषि को सिंचित करती हैं और जनजीवन का आधार हैं। ये नदियाँ केवल जल ही नहीं, बल्कि सभ्यता और संस्कृति का प्रवाह भी लाती हैं।
घन-संपन्नता-भारत पर प्रकृति की विशेष कृपा है। यहाँ पर खनिज पदार्थों की भरमार है। अपनी अपार संपदा के कारण ही इसे “सोने की चिड़िया' की संज्ञा दी गई है। धन-संपदा के कारण ही हमारा देश विदेशी आक्रमणकारियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा है।
उत्तर: भारत प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण रहा है, इसीलिए इतिहास में इसे 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था। यहाँ कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, ताँबा, सोना, हीरे आदि खनिजों के विशाल भंडार हैं। उपजाऊ भूमि, सघन वन और विशाल जल संसाधन इसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यही समृद्धि प्राचीन काल से ही विदेशी आक्रमणकारियों को आकर्षित करती रही, परंतु भारत की संस्कृति और लोगों की शक्ति ने हर चुनौती का सामना किया।
श्रेष्ठ सभ्यता-संस्कृति-भारत की सभ्यता और संस्कृति संसार की प्राचीनतम सभ्येताओं में गिनी जाती है। मानव-संस्कृति के आदिम ग्रंथ ऋग्वेद की रचना का श्रेय इसी देश को प्राप्त है। संसार की प्रायः सभी प्राचीन संस्कृतियाँ नष्ट हो चुकी हैं परंतु भारतीय संस्कृति समय की
उत्तर: भारत की सभ्यता और संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन और जीवंत सभ्यताओं में से एक है। सिंधु घाटी सभ्यता इसकी प्राचीनता का प्रमाण है। ऋग्वेद जैसे ग्रंथों ने मानव ज्ञान का मार्गदर्शन किया। समय के थपेड़ों और विदेशी आक्रमणों के बावजूद भारतीय संस्कृति न केवल बची रही, बल्कि फली-फूली। इसकी लचीलापन और ग्रहणशीलता ही इसकी अमरता का रहस्य है।
आँधियों और तूफानों का सामना करती हुई अब भी अपनी उच्चता और महानता का शंखनाद - कर रही है। संगीतकला, चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्य कला आदि के क्षेत्र में भी हमारी उन्नति आश्चर्य में डाल देने वाली है। जिस समय संसार का एक बड़ा भाग घुमंतू जीवन बिता रहा था, हमारा देश भारत उच्चकोटि की नागरिक सभ्यता का विकास कर चुका था। सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ सर जॉन मार्शल लिखता है.-'सिंधु घाटी का साधारण नागरिक सुविधाओं और विलास का जिस मात्रा में उपयोग करता था, उसकी तुलना उस समय के सभ्य संसार के दूसरे भागों से नहीं की जा सकतीं।'
उत्तर: भारतीय संस्कृति ने हज़ारों वर्षों के उतार-चढ़ाव को झेलते हुए भी अपनी महानता बनाए रखी है। कला के क्षेत्र में इसकी उपलब्धियाँ अद्वितीय हैं - संगीत के राग, चित्रकला की विधाएँ, मूर्तिकला का सौंदर्य और स्थापत्य कला के अद्भुत नमूने (जैसे ताजमहल, कोणार्क सूर्य मंदिर) विश्वप्रसिद्ध हैं। सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) के समय जब दुनिया के अधिकांश लोग खानाबदोश जीवन जी रहे थे, तब भारत में सुनियोजित नगर, स्नानागार और उन्नत जल निकासी प्रणाली मौजूद थी। इतिहासकार सर जॉन मार्शल के अनुसार, उस समय के एक साधारण भारतीय नागरिक का जीवन स्तर समकालीन विश्व के अन्य भागों से कहीं अधिक उन्नत था।
ज्ञान मैं अग्रणी - हमारा प्यारा देशःविश्व गुर रहा है। यहाँ की कला, ज्ञान-विज्ञाब, ज्योतिष, आयुर्वेद संसार के प्रकाशदाता रहे हैं। यह देश ऋषि-मुनियों, घर्म-प्रवर्तकों तथा महान कवियों का देश है। त्याग हमारे देश का सदा से मूल मंत्र रहा है। जिसने त्याग किया, वही महान कहलाया। बुद्ध, महावीर, दधीचि, रंतिदेव, राजा शिवि, रामकृष्ण परमहंस, गाँधी इत्यादि महान विभूतियाँ इसका जीता-जागता प्रमाण हैं।
उत्तर: भारत सदैव से ज्ञान और आध्यात्म का विश्व गुरु रहा है। यहाँ गणित में शून्य और दशमलव प्रणाली का आविष्कार हुआ। आयुर्वेद ने चिकित्सा विज्ञान को नई दिशा दी। ज्योतिष और खगोल विज्ञान में भी भारत का योगदान अतुलनीय है। यह भूमि ऋषि-मुनियों, महान दार्शनिकों, धर्म प्रवर्तकों और कवियों की जननी रही है। त्याग और सेवा यहाँ के मूल मंत्र रहे हैं। भगवान बुद्ध, महावीर स्वामी, गुरु नानक, संत तुकाराम, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, महात्मा गांधी जैसी विभूतियों ने इसी धरती पर जन्म लेकर मानवता को नया पाठ पढ़ाया।
विविधता में एकता-भारत विविध रंगबिरंगे फूलों का गुलदस्ता है। यहाँ जाति, रंग, धर्म, मन, परंपरा, खान-पान, ऋतु, पहनावे-सबकी विविधता दिखाई देती हैं। उन विविधताओं में भी अद्भुत मेल है। हिंदू, मुसलमान, ईसाई बड़े प्रेम से साथ-साथ रहते हैं।
उत्तर: भारत विविधताओं से भरा एक सुंदर गुलदस्ता है। यहाँ अलग-अलग जाति, भाषा, धर्म, रीति-रिवाज, खानपान और पहनावे वाले लोग रहते हैं। परंतु इन सभी विविधताओं के बीच एक अद्भुत सामंजस्य और एकता देखने को मिलती है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी सभी धर्मों के लोग प्रेमपूर्वक साथ रहते हैं, एक-दूसरे के त्योहार मनाते हैं। यह 'विविधता में एकता' ही भारत की सबसे बड़ी पहचान और ताकत है।
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